India Auto Sector का शानदार प्रदर्शन: रिकॉर्ड उत्पादन, पर EV बैटरी में लटकती तलवार!

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AuthorAditya Rao|Published at:
India Auto Sector का शानदार प्रदर्शन: रिकॉर्ड उत्पादन, पर EV बैटरी में लटकती तलवार!
Overview

भारतीय Auto Sector ने फाइनेंशियल ईयर 2025 में जबरदस्त परफॉरमेंस दी है! इस सेक्टर का सालाना उत्पादन लगभग **3.1 करोड़ यूनिट्स** तक पहुँच गया है, जो एक नया रिकॉर्ड है। वहीं, एक्सपोर्ट्स भी **53 लाख यूनिट्स** के पार निकल गए हैं। यह सब सरकार की प्रोडक्शन लिंक्ड इनसेंटिव (PLI) स्कीम्स के चलते संभव हुआ है, जिनकी कुल लागत करीब **₹44,000 करोड़** है। लेकिन, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की ओर बढ़ते कदम के बीच, खासकर बैटरी मैन्युफैक्चरिंग में बड़ी एग्जीक्यूशन चुनौतियों ने चिंता बढ़ा दी है।

ऑटो सेक्टर का दबदबा: रिकॉर्ड्स पर रिकॉर्ड्स

फाइनेंशियल ईयर 2025 में 3.1 करोड़ यूनिट्स का रिकॉर्ड उत्पादन और 53 लाख यूनिट्स से अधिक का एक्सपोर्ट, ये आंकड़े भारतीय ऑटो इंडस्ट्री की बुलंदी साफ दिखाते हैं। सरकारी PLI स्कीम्स का बड़ा सहारा मिला है, जिनका मकसद डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत करना और इंडिया को ग्लोबल ऑटो सप्लाई नेटवर्क का अहम हिस्सा बनाना है। मगर, इन शानदार आंकड़ों के पीछे एक कड़वी सच्चाई भी छुपी है – स्थापित सेगमेंट्स में बड़ी उपलब्धियों और भविष्य की महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजी, खासकर बैटरी प्रोडक्शन के विकास में बड़ा अंतर है।

पॉलिसी सपोर्ट से प्रोडक्शन और एक्सपोर्ट्स में उछाल

वित्तीय वर्ष 2025 में ऑटो इंडस्ट्री ने उत्पादन के मामले में एक नया मुकाम छुआ है, जहां प्रोडक्शन 3.1 करोड़ यूनिट्स तक पहुंच गया, जो FY24 के 2.84 करोड़ यूनिट्स से कहीं ज्यादा है। इसी के साथ, वाहनों के एक्सपोर्ट्स में भी बड़ी उछाल देखी गई, जो 45 लाख यूनिट्स से बढ़कर 53 लाख यूनिट्स से अधिक हो गए। इस विकास को सरकारी नीतियों का बड़ा सहारा मिला है। ऑटोमोबाइल और ऑटो कंपोनेंट्स के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इनसेंटिव (PLI) स्कीम, जिसमें करीब ₹26,000 करोड़ का फंड है, का मकसद एडवांस्ड ऑटोमोटिव टेक्नोलॉजीज को बढ़ावा देना और डोमेस्टिक वैल्यू एडिशन को बढ़ाना है। इसके साथ ही, एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल (ACC) बैटरीज के लिए ₹18,100 करोड़ की PLI स्कीम भी है, जिसका लक्ष्य 50 GWh की डोमेस्टिक बैटरी मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी स्थापित करना और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी इकोसिस्टम को मजबूत करना है। 'मेड इन इंडिया' वाहन अब ग्लोबल मार्केट में अपनी जगह बना रहे हैं, खासकर अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों में एक्सपोर्ट्स अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं।

ग्लोबल रैंकिंग और टेक्नोलॉजी पर नजर

दुनिया भर में ऑटो इंडस्ट्री में भारत एक बड़ा खिलाड़ी है, जो वाहनों के उत्पादन में चौथे स्थान पर आता है। 2024 में 60 लाख यूनिट्स से ज्यादा का उत्पादन करने के बावजूद, यह चीन के 3.1 करोड़ यूनिट्स के मुकाबले काफी कम है। यही वजह है कि भारत ग्लोबल वैल्यू चेन्स (GVCs) में गहराई से जुड़ने की कोशिश कर रहा है। ऑटो कंपोनेंट सेक्टर, जिसका वैल्यूएशन H1 FY25 में $39.6 बिलियन था, का लक्ष्य 2030 तक एक्सपोर्ट्स को $60 बिलियन तक पहुंचाना है, जिससे ग्लोबल ट्रेडेड ऑटो कंपोनेंट्स मार्केट में भारत की हिस्सेदारी 3% से बढ़कर 8% हो सकती है। फोकस एडवांस्ड ऑटोमोटिव टेक्नोलॉजीज, जैसे इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) पर बढ़ रहा है, जिनके रजिस्ट्रेशन FY25 में 16.9% बढ़े हैं। एनालिस्ट्स का अनुमान है कि 2030 तक पैसेंजर ईवी प्रोडक्शन 13.3 लाख यूनिट्स तक पहुंच सकता है, जो कुल पैसेंजर वाहनों का करीब 20% होगा। हालांकि, इन बड़े लक्ष्यों को हासिल करने के लिए मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी और सप्लाई चेन लोकलाइजेशन में काफी सुधार की ज़रूरत है।

EV बैटरी निर्माण में बड़ी रुकावटें

उत्पादन और एक्सपोर्ट के इन अच्छे आंकड़ों के बावजूद, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग, खासकर EV बैटरी सेगमेंट में, बड़ी एग्जीक्यूशन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ACC बैटरी PLI स्कीम, जिसका लक्ष्य 2025 तक 50 GWh की डोमेस्टिक गीगाफैक्ट्री कैपेसिटी खड़ी करना था, उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी है। जनवरी 2026 तक, केवल 1.4 GWh कैपेसिटी ही शुरू हुई है, और बाकी प्रोजेक्ट्स में भी काफी देरी हो रही है। अभी तक एक पैसा भी इंसेंटिव के तौर पर नहीं बांटा गया है। इस धीमी रफ्तार के पीछे गीगाफैक्ट्री के लिए अवास्तविक समय-सीमा, डोमेस्टिक मिनरल प्रोसेसिंग कैपेसिटी की कमी, और कच्चे माल के आयात पर निर्भरता को कारण बताया जा रहा है। सेक्टर की सप्लाई चेन कमजोर बनी हुई है, खासकर दुर्लभ पृथ्वी तत्वों (rare earth elements) और सेमीकंडक्टर जैसे महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स के लिए चीन पर भारी निर्भरता है, जो चीन के इंटीग्रेटेड सप्लाई चेन मॉडल के बिल्कुल विपरीत है। इसके अलावा, भारत का ऑटो कंपोनेंट ट्रेड काफी हद तक आत्मनिर्भर है, जिसमें एक्सपोर्ट और इंपोर्ट लगभग बराबर हैं, जो ग्लोबल वैल्यू चेन्स में सीमित पैठ को दर्शाता है। लॉजिस्टिक्स में रुकावटें, जैसे मौजूदा रेड सी संकट, एक्सपोर्ट कॉम्पिटिटिवनेस को प्रभावित कर रही हैं और ट्रांजिट टाइम बढ़ा रही हैं। डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम के भीतर, पुरानी इंफ्रास्ट्रक्चर, सीमित ऑटोमेशन और इन्वेंटरी मैनेजमेंट जैसी समस्याएं बनी हुई हैं, खासकर छोटे और मझोले उद्यमों (SMEs) के लिए, जिन्हें इकोनॉमी ऑफ स्केल और ग्लोबल मार्केट्स तक पहुंचने में मुश्किलें आती हैं। इतना ही नहीं, एडवांस्ड टेक्नोलॉजीज में क्षमता की कमी और सस्टेनेबल अल्टरनेटिव्स के लिए R&D में अपर्याप्त निवेश लंबी अवधि की ग्लोबल कॉम्पिटिटिवनेस के लिए खतरा पैदा करते हैं। उदाहरण के लिए, Tata Motors का वर्तमान P/E रेश्यो लगभग 20.6-73.4 (फरवरी 2026 तक) दर्शाता है, लेकिन लगातार ग्रोथ इन बुनियादी ऑपरेशनल और स्ट्रेटेजिक एग्जीक्यूशन जोखिमों को दूर करने पर निर्भर करेगी।

भविष्य की राह: चुनौतियों के बीच विकास की उम्मीद

आगे चलकर, भारतीय ऑटो सेक्टर घरेलू मांग, सरकारी नीतियों और इलेक्ट्रिक व एडवांस्ड मोबिलिटी सॉल्यूशंस पर बढ़ते फोकस से प्रेरित होकर लगातार ग्रोथ के लिए तैयार है। एनालिस्ट्स EV मार्केट और ऑटो कंपोनेंट सेक्टर में महत्वपूर्ण विस्तार की उम्मीद कर रहे हैं, जिसमें 2030 तक एक्सपोर्ट्स $70-$100 बिलियन तक पहुंच सकते हैं। NITI Aayog का विजन 2030 तक ऑटोमोटिव कंपोनेंट प्रोडक्शन को $145 बिलियन तक ले जाने का है। हालांकि, इन अनुमानों का हकीकत में बदलना महत्वपूर्ण चुनौतियों के प्रभावी समाधान पर निर्भर करेगा, खासकर बैटरी मैन्युफैक्चरिंग पहलों के एग्जीक्यूशन को सुव्यवस्थित करने और सप्लाई चेन की कमजोरियों को कम करने में। भू-राजनीतिक बदलावों को नेविगेट करने, तकनीकी प्रगति को अपनाने और वास्तव में एक एकीकृत ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग उपस्थिति को बढ़ावा देने की इंडस्ट्री की क्षमता आने वाले दशक में इसकी सफलता तय करेगी।

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