भारतीय ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री ने इंपोर्ट पर अपनी निर्भरता को **₹20,000 करोड़** से ज्यादा घटाया है। FY20 के मुकाबले यह **16.6%** की बड़ी गिरावट है, लेकिन बढ़ते ट्रेड डेफिसिट और कच्चे माल की बढ़ती लागत ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है।
स्वदेशीकरण की रफ्तार
सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) के आंकड़ों के मुताबिक, देश में इंजन, आयरन और स्टील जैसे जरूरी पार्ट्स के घरेलू प्रोडक्शन में तेजी आई है। ऑटोमोटिव कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ACMA) के सहयोग से यह उपलब्धि हासिल की गई है। FY26 के दौरान डोमेस्टिक मार्केट में भारी उछाल देखा गया, जिसमें पैसेंजर व्हीकल की 4.64 मिलियन यूनिट्स और टू-व्हीलर की 21.71 मिलियन यूनिट्स की रिकॉर्ड बिक्री दर्ज की गई है।
ट्रेड डेफिसिट का पेंच
इंपोर्ट कम करने के बावजूद, सेक्टर के सामने एक बड़ी चुनौती ट्रेड बैलेंस की है। FY26 में ऑटो कंपोनेंट इंडस्ट्री का ट्रेड डेफिसिट करीब $1.37 बिलियन पहुंच गया। इसकी मुख्य वजह यह है कि कंपोनेंट इंपोर्ट में 13% की बढ़त हुई है, जबकि एक्सपोर्ट में केवल 5% की ही बढ़ोतरी देखी गई। यह दिखाता है कि हाई-टेक पार्ट्स के लिए अभी भी विदेशी निर्भरता बनी हुई है।
मुनाफे पर दबाव और बाजार का मूड
बिक्री के शानदार आंकड़ों के बावजूद, कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव है। स्टील और रबर जैसी कच्ची सामग्रियों की बढ़ती कीमतों और वेस्ट एशिया में जारी जियोपॉलिटिकल तनाव ने सप्लाई चेन को प्रभावित किया है। सितंबर 2026 की शुरुआत में ऑटो स्टॉक्स में दिखी बिकवाली बताती है कि निवेशक फिलहाल शॉर्ट-टर्म प्रॉफिटेबिलिटी को लेकर काफी सतर्क हैं।
भविष्य की रणनीति: ई-व्हीकल पर दांव
इंडस्ट्री अब पूरी तरह एनर्जी ट्रांजिशन की ओर देख रही है। PM E-Drive स्कीम के चलते इलेक्ट्रिक व्हीकल का रजिस्ट्रेशन 2.5 मिलियन यूनिट्स पहुंच गया है, जो सालाना 25% की ग्रोथ है। अब निवेशकों की नजर 'ऑटोमोटिव मिशन प्लान 2025-2047' पर है, जिसमें ग्रीन-हाइड्रोजन टेक्नोलॉजी और व्हीकल रीसाइक्लिंग सिस्टम पर खास जोर दिया जाएगा।
