हाल ही में पर्यावरण संरक्षण (एंड-ऑफ-लाइफ व्हीकल्स) नियम, 2025 में हुए संशोधन ने भारतीय ऑटोमोटिव सेक्टर को एक मुश्किल स्थिति में डाल दिया है। यह नियम दरअसल कंपनियों के तत्काल परिचालन (operations) में बदलाव से कहीं ज़्यादा, एक रेट्रोस्पेक्टिव (retrospective) अकाउंटिंग नियम है।
अकाउंटिंग का नया नियम
मुख्य समस्या जनवरी 2025 की अधिसूचना के रूल 4(6) में है। इसके तहत, निर्माताओं को पहले से बेचे गए वाहनों के लिए एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी (EPR) का फंड देना होगा, भले ही उनके ऑपरेशंस बंद हो गए हों। भारतीय अकाउंटिंग स्टैंडर्ड (Ind AS) 37 के अनुसार, कंपनियों को पर्यावरण संबंधी मुआवज़े के लिए भारी प्रोविज़न (provision) बुक करना होगा। ये प्रोविज़न पिछले 20 सालों (निजी उपयोग) और 15 सालों (व्यावसायिक उपयोग) में बिके वाहनों के लिए होंगे।
सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) के शुरुआती अनुमानों के मुताबिक, फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के लिए यह एकमुश्त बड़ा झटका लगभग ₹25,000 करोड़ का हो सकता है। डिस्काउंटेड (discounted) आधार पर यह रकम करीब ₹9,000 करोड़ है। इस वित्तीय बोझ को बांटा गया है, जिसमें कार निर्माताओं पर लगभग ₹14,623 करोड़ और दो/तीन पहिया वाहन निर्माताओं पर अतिरिक्त ₹9,650 करोड़ का असर पड़ेगा।
नियामक रुख सख्त
SIAM के नेतृत्व में उद्योग समूहों ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (Ministry of Environment, Forest and Climate Change) से गुहार लगाई थी। उन्होंने इस अनिवार्य प्रोविज़निंग के भारी वित्तीय प्रभाव को रेखांकित किया था। SIAM ने उम्मीद जताई थी कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा पर्यावरण मुआवज़े की लागतें आधिकारिक तौर पर अधिसूचित होने से पहले नियम 4(6) में संशोधन किया जाएगा, ताकि पिछली लागतों को बुक करने से बचा जा सके।
हालांकि, 27 मार्च, 2026 को जारी एक अमेंडमेंट (amendment) नोटिफिकेशन में इस मुख्य क्लॉज़ (clause) को नहीं बदला गया। इस सख्ती का मतलब है कि ऑटोमेकर्स को इन पिछली पर्यावरणीय जिम्मेदारियों का हिसाब देना ही होगा। पर्यावरण संरक्षण (एंड-ऑफ-लाइफ व्हीकल्स) अमेंडमेंट रूल्स, 2026 ने EPR और प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी के ढांचे को और मजबूत किया है, जिसमें फाइनेंशियल ईयर 2005-06 से बिक्री डेटा की रिपोर्टिंग अनिवार्य है।
निवेशों पर असर
Ind AS 37 के तहत पिछली बिक्री के लिए फंड अलग रखना, भारतीय ऑटो सेक्टर की ग्रोथ और इनोवेशन (innovation) योजनाओं के लिए एक बड़ी चुनौती है। यह नियम प्रभावी रूप से उस पूंजी को दूसरी ओर मोड़ देगा जिसका उपयोग रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) में हो सकता था, खासकर इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs) और एडवांस्ड ड्राइवर-असिस्टेंस सिस्टम्स (ADAS) जैसे तेज़ी से बढ़ते क्षेत्रों में।
हालांकि ऑटो सेक्टर में अच्छी डिमांड और FY26 के लिए मुनाफे की उम्मीदें थीं, जिसमें बेहतर अफोर्डेबिलिटी (affordability) और नए मॉडलों से EBITDA ग्रोथ दिखने की रिपोर्टें थीं, लेकिन यह अकाउंटिंग चार्ज अप्रत्याशित रूप से मुनाफे और कैश फ्लो (cash flow) में सेंध लगा रहा है। यह रेट्रोस्पेक्टिव वित्तीय देनदारी सीधे तौर पर निर्माताओं की नई टेक्नोलॉजी और विस्तार में निवेश करने की क्षमता को सीमित करती है।
निवेशकों की चिंता
संस्थागत निवेशकों (institutional investors) के नजरिए से, उद्योग की अपीलों के बावजूद मंत्रालय का यह दृढ़ रुख, औद्योगिक विकास के साथ नियामक नीतियों के संरेखण (alignment) पर सवाल खड़े करता है। हालांकि हालिया विश्लेषक रिपोर्टों (analyst reports) ने FY26 के लिए भारतीय ऑटो सेक्टर की मजबूत लाभप्रदता (profitability) की भविष्यवाणी की थी, लेकिन ₹25,000 करोड़ का यह प्रोविज़निंग एक बड़ा अप्रत्याशित घटनाक्रम है जो रिपोर्टिंग अवधि के लिए नेट प्रॉफिट को काफी कम कर सकता है।
स्थिरता (sustainability) और सर्कुलर इकोनॉमी (circular economy) के सिद्धांतों की ओर सक्रिय कदम उठाने के बजाय, यह नियम भविष्य के पर्यावरण-अनुकूल अभ्यासों को प्रोत्साहन देने के बजाय एक पिछली वित्तीय देनदारी थोपता है। इसकी कठोरता सर्कुलर इकोनॉमी ढांचे का सख्त पालन सुझाती है, जो भविष्य के अनुपालन (compliance) और प्रतिस्पर्धात्मकता (competitiveness) के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण तकनीकों जैसे EVs में तत्काल निवेश को बाधित कर सकता है। इससे भारतीय निर्माताओं को अलग नियामक लागत संरचनाओं वाले वैश्विक प्रतिस्पर्धियों की तुलना में नुकसान हो सकता है।
आगे का नज़रिया
वित्तीय वर्ष 2026 में, ये प्रोविज़न बुक किए जाने के कारण भारतीय ऑटो उद्योग को रिपोर्ट किए गए मुनाफे में खासी कमी देखने को मिलेगी। आगे चलकर, निर्माताओं को इन अनुपालन लागतों (compliance costs) को इनोवेशन, विस्तार और क्लीनर मोबिलिटी (cleaner mobility) की ओर बदलाव के अपने लक्ष्यों के साथ संतुलित करना होगा।
EV विकास और महत्वाकांक्षी निर्यात योजनाओं के लिए आवश्यक निरंतर निवेश, इस अप्रत्याशित अकाउंटिंग जनादेश के कारण बड़े वित्तीय दबाव का सामना कर सकता है, जिससे एक कठिन ऑपरेटिंग माहौल (operating environment) बन रहा है।
