भारतीय ऑटोमोबाइल सेक्टर के लिए फाइनेंशियल ईयर 2026 ऐतिहासिक रहा है। पैसेंजर व्हीकल की बिक्री **46 लाख** यूनिट्स के पार पहुंच गई है और EV रजिस्ट्रेशन **35 लाख** के आंकड़े को छू चुका है। हालांकि, नए लोकलाइजेशन नियमों और हाई बेस के चलते आगे की चुनौती बढ़ गई है।
भारतीय ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री ने फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में शानदार प्रदर्शन करते हुए देश की इकोनॉमी में अपनी अहमियत को और मजबूत किया है। यह सेक्टर अब देश की इकोनॉमी में ₹22.75 लाख करोड़ का योगदान दे रहा है और कुल GST कलेक्शन में इसकी हिस्सेदारी 15% है।
सेल्स का रिकॉर्ड
पैसेंजर व्हीकल की बिक्री में 7.9% की बढ़त दर्ज की गई है, जिससे यह आंकड़ा 46 लाख यूनिट्स तक पहुंच गया है। वहीं, टू-व्हीलर सेगमेंट में 10.7% की उछाल के साथ डोमेस्टिक सेल्स 2.17 करोड़ यूनिट्स रही। भारतीय मैन्युफैक्चरर्स ने ग्लोबल मार्केट में भी अपनी धाक जमाई है। इसके अलावा, 1 अप्रैल 2025 तक इंडस्ट्री ने E20-कंप्लायंट पेट्रोल प्रोडक्शन में शत-प्रतिशत बदलाव का बड़ा माइलस्टोन हासिल कर लिया है।
EV एडॉप्शन और सरकारी पॉलिसी
इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) अब सिर्फ एक निश सेगमेंट नहीं रहा, बल्कि मेनस्ट्रीम बन चुका है। सरकार की PM E-DRIVE स्कीम, जिसका कुल बजट ₹10,900 करोड़ है, मार्च 2028 तक सेक्टर को रफ्तार देने का काम करेगी। हालांकि, 1 सितंबर 2026 से लागू हुए इलेक्ट्रिक बस और ट्रक के नए लोकलाइजेशन नियमों ने मैन्युफैक्चरर्स के लिए चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। घरेलू सप्लाई चेन बनाने की कोशिश में शॉर्ट-टर्म में प्रोडक्शन कॉस्ट और टाइमलाइन पर असर पड़ सकता है।
निवेशकों के लिए काम की बात
इन्वेस्टर्स को अब संभलकर चलने की जरूरत है। FY26 की शानदार ग्रोथ के बाद अब 'हाई बेस' की चुनौती है, जिससे आने वाली तिमाहियों में ग्रोथ की रफ्तार धीमी हो सकती है। इसके अलावा, EV मोटर्स में इस्तेमाल होने वाले 'रेयर-अर्थ परमानेंट मैग्नेट्स' के लिए इंपोर्ट पर निर्भरता एक बड़ा रिस्क है। मार्केट अब मंथली रजिस्ट्रेशन डेटा और कंपनियों के मार्जिन पर इन नए नियमों के असर को बारीकी से ट्रैक करेगा।
