साल 2026 के पहले 9 महीनों में भारतीय ऑटो सेक्टर ने दमदार रफ्तार पकड़ी है। कुल वॉल्यूम **23.44 मिलियन यूनिट्स** के पार पहुंच गया है, जिसमें यूटिलिटी व्हीकल्स की डिमांड सबसे ज्यादा रही। अब सबकी नजरें Tata Motors और Mahindra & Mahindra की उस जंग पर हैं, जो दूसरे स्थान के लिए छिड़ी हुई है।
भारतीय ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री के लिए साल 2026 का पहला नौ महीने का सफर शानदार रहा है। कुल डोमेस्टिक वॉल्यूम 23.44 मिलियन यूनिट्स तक पहुंच गया है, जो पिछले साल की समान अवधि के 19.37 मिलियन यूनिट्स से कहीं ज्यादा है। SIAM के आंकड़ों के मुताबिक, जीएसटी 2.0 रिफॉर्म्स और लोगों की बढ़ती खर्च करने की क्षमता (spending power) ने इस ग्रोथ को रफ्तार दी है।
दूसरे पायदान के लिए कड़ा मुकाबला
हालांकि Maruti Suzuki अभी भी बाजार में बादशाह बनी हुई है, लेकिन दूसरे नंबर के लिए Tata Motors और Mahindra & Mahindra के बीच कांटे की टक्कर है। Tata Motors ने इस अवधि में 5,75,583 यूनिट्स के साथ 40.3% की जबर्दस्त सालाना ग्रोथ दर्ज की है। वहीं, Mahindra & Mahindra ने 5,41,942 यूनिट्स बेचकर 21.3% की बढ़त दिखाई है। Hyundai Motor India 4,71,724 यूनिट्स के साथ तीसरे नंबर पर है। निवेशकों के लिए चिंता का विषय यह है कि मार्केट शेयर हासिल करने की इस होड़ में कहीं कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव न पड़ जाए, क्योंकि डिस्काउंट और मार्केटिंग पर खर्च बढ़ सकता है।
यूटिलिटी व्हीकल्स (SUV) का जलवा
बाजार में यूटिलिटी व्हीकल्स की मांग सबसे ज्यादा देखी जा रही है। जुलाई-सितंबर तिमाही में कुल पैसेंजर व्हीकल सेल्स में इनका हिस्सा 68% रहा है। यह सेगमेंट 34.2% की दर से बढ़ा है, जबकि आम कारों की बिक्री 24.9% ही बढ़ी। हाई-वैल्यू सेगमेंट होने के नाते यह कंपनियों के मुनाफे के लिए तो अच्छा है, लेकिन कंपनी को अपने नए लॉन्चेज की पाइपलाइन को लगातार मजबूत रखना होगा।
कमर्शियल व्हीकल और आगे की चुनौती
इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में तेजी के कारण कमर्शियल व्हीकल सेगमेंट में 37% की शानदार ग्रोथ देखी गई है। वहीं, टू-व्हीलर सेगमेंट में स्कूटरों की मांग 27.7% रही, जबकि मोटरसाइकिल सिर्फ 7.4% बढ़ीं।
भले ही आंकड़े पॉजिटिव हों, लेकिन निवेशकों को महंगाई और ब्याज दरों (interest rates) के असर पर बारीक नजर रखनी चाहिए। अगर लोन महंगे हुए, तो डिमांड ठंडी पड़ सकती है। साथ ही, कंपनियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा भी उनकी कीमतें बढ़ाने की ताकत को सीमित कर रही है, जिससे मुनाफे पर दबाव बना रह सकता है।
