रिकॉर्ड बिक्री के पीछे UVs का जलवा और सरकारी नीतियां
भारतीय पैसेंजर व्हीकल (PV) सेक्टर ने फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में 46.4 लाख यूनिट्स की रिकॉर्ड डोमेस्टिक बिक्री दर्ज की। यह पिछले साल के मुकाबले 7.9% की मजबूत बढ़ोतरी दिखाता है। इस शानदार प्रदर्शन के पीछे सबसे बड़ा हाथ यूटिलिटी व्हीकल्स (UVs) का रहा, जिनकी मांग में जबरदस्त उछाल देखा गया। यह ग्राहकों की पसंद में एक बड़े स्ट्रक्चरल बदलाव का संकेत देता है, जिसमें UVs और SUV का मार्केट शेयर लगातार बढ़ रहा है। पूरे साल UVs की बिक्री में 11% की बढ़ोतरी हुई, जबकि चौथी तिमाही में यह 20.1% तक पहुंच गई। अब कुल डोमेस्टिक PV बिक्री में UVs का हिस्सा करीब 65% है। पैसेंजर कारें ( 1.9% ग्रोथ) और वैन ( 5.5% ग्रोथ) में मामूली बढ़ोतरी देखी गई। इस दौरान 0.91 मिलियन यूनिट्स के रिकॉर्ड एक्सपोर्ट भी हुए, जो 17.5% ज्यादा हैं।
सरकारी नीतियां और affordability बनीं मददगार
इंडस्ट्री की इस रिकॉर्ड परफॉर्मेंस में सरकारी नीतियों और बेहतर affordability का बड़ा योगदान रहा। गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) में बदलाव, इनकम टैक्स में राहत और लगातार हुए रेपो रेट कट ने व्हीकल खरीदने की लागत को काफी कम कर दिया। इन कदमों ने शुरुआती सुस्त मांग को पलट दिया और फाइनेंशियल ईयर की दूसरी छमाही में PV बिक्री में 16.7% की जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि पहली छमाही में यह सिर्फ 1.4% घट गई थी। पॉलिसी से मिले बूस्ट को FY2026 की स्ट्रेंथ का मुख्य कारण माना जा रहा है।
इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का उभार और एक्सपोर्ट की कहानी
भारतीय ऑटोमोबाइल मार्केट में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी (EVs) का दबदबा तेजी से बढ़ रहा है। FY2026 के दौरान इलेक्ट्रिक PV रजिस्ट्रेशन में 80% से ज्यादा का उछाल देखा गया। फाइनेंशियल ईयर के अंत तक कुल EV रजिस्ट्रेशन में इनकी हिस्सेदारी लगभग 8.5% पहुंच गई। हालांकि, पैसेंजर व्हीकल EV पेनिट्रेशन ग्लोबल लीडर्स की तुलना में अभी कम है, लेकिन यह सेगमेंट तेजी से बढ़ रहा है।
वहीं, भारत एक ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब के तौर पर उभरा है, जिसके चलते एक्सपोर्ट 0.91 मिलियन यूनिट्स के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए, जो 17.5% ज्यादा है। हालांकि, पश्चिम एशिया जैसे प्रमुख बाजारों में चल रहे भू-राजनीतिक व्यवधानों के कारण एक्सपोर्ट की यह गति भी प्रभावित हो सकती है।
FY27 के लिए बड़े खतरे: तेल की बढ़ती कीमतें और भू-राजनीति
रिकॉर्ड बिक्री के बावजूद, भारतीय ऑटो सेक्टर के सामने फाइनेंशियल ईयर 2027 के लिए कई गंभीर चुनौतियां हैं। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के चलते कच्चा तेल $100 प्रति बैरल के पार चला गया है। इससे भारत का एनुअल इंपोर्ट बिल बढ़ेगा और करेंसी की स्थिरता पर भी खतरा मंडरा रहा है। कच्चे तेल की बढ़ी कीमतों का सीधा असर फ्यूल और लॉजिस्टिक्स कॉस्ट पर पड़ रहा है, जिससे सप्लाई चेन में बाधाएं आ सकती हैं और कॉम्पोनेंट मैन्युफैक्चरर्स पर दबाव बढ़ सकता है।
लगातार ऊंची तेल कीमतों से कंज्यूमर्स के लिए व्हीकल महंगे हो सकते हैं, जिससे पॉलिसी रिफॉर्म्स से मिली affordability कम हो जाएगी और खासकर एंट्री-लेवल व्हीकल्स की डिमांड गिर सकती है। रेटिंग एजेंसियां जैसे ICRA और Crisil, FY2027 के लिए PV ग्रोथ को घटाकर 3-6% कर रही हैं, जिसका मुख्य कारण FY2026 का हाई बेस इफेक्ट और बाहरी जोखिमों का बढ़ना है।
आगे का रास्ता: उम्मीदें और चिंताएं
इंडस्ट्री के लीडर्स फाइनेंशियल ईयर 2027 के लिए सावधानी भरी उम्मीद जता रहे हैं, और डोमेस्टिक डिमांड व प्रोडक्ट इनोवेशन जारी रहने की उम्मीद है। कच्चे तेल की कीमतों में अचानक उछाल, सप्लाई चेन में रुकावटें और करेंसी की अस्थिरता मुख्य जोखिम बने हुए हैं, जो मार्जिन और डिमांड को प्रभावित कर सकते हैं। ICRA का अनुमान है कि FY2027 में होलसेल वॉल्यूम ग्रोथ FY2026 के मुकाबले घटकर 3-6% की रेंज में रहेगी।
इंडस्ट्री इन चुनौतियों से निपटने के लिए लोकलाइजेशन बढ़ाने और सप्लाई चेन को डाइवर्सिफाई करने की योजना बना रही है, साथ ही इनपुट कॉस्ट और कंज्यूमर खर्च को प्रभावित करने वाले घटनाक्रमों पर भी बारीकी से नजर रखी जा रही है।