Auto Sector Crisis: EV की रेस में फंसी ऑटो कंपनियां, लेबर की कमी से प्रोडक्शन पर संकट

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AuthorNeha Patil|Published at:
Auto Sector Crisis: EV की रेस में फंसी ऑटो कंपनियां, लेबर की कमी से प्रोडक्शन पर संकट

भारत की ऑटो-कंपोनेंट बनाने वाली करीब **61%** कंपनियां इस समय गंभीर लेबर शॉर्टेज से जूझ रही हैं। इसका सीधा असर Mahindra & Mahindra और Bajaj Auto जैसी बड़ी कंपनियों के प्रोडक्शन पर पड़ रहा है। EV ट्रांजिशन की वजह से बढ़े इस 'स्किल गैप' ने पूरी सप्लाई चेन के लिए रिस्क पैदा कर दिया है।

भारत का ऑटो सेक्टर एक बड़े स्ट्रक्चरल बदलाव के दौर से गुजर रहा है। अभी स्थिति यह है कि करीब 61% ऑटो-कंपोनेंट कंपनियां स्किल्ड मैनपावर की किल्लत से परेशान हैं। यह समस्या खास तौर पर हाई-वोल्टेज बैटरी सिस्टम, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और AI-आधारित मैन्युफैक्चरिंग में ज्यादा है। यह अब सिर्फ एक ऑपरेशनल दिक्कत नहीं रह गई है, बल्कि सीधे देश की दिग्गज ऑटो कंपनियों की प्रोडक्शन क्षमता को नुकसान पहुंचा रही है।

प्रोडक्शन पर असर

जून 2026 के आंकड़े देखें तो Mahindra & Mahindra के कुछ प्लांट में प्रोडक्शन 15% तक धीमा हुआ है, जिसकी मुख्य वजह Tier-2 और Tier-3 सप्लायर्स के यहां वर्कर की कमी रही। वहीं, Bajaj Auto अपनी सालाना मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को 70 लाख से बढ़ाकर 90 लाख यूनिट तक ले जाने की तैयारी में है, लेकिन सप्लायर्स के लेवल पर मौजूद ये अड़चनें इस प्लान के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।

क्यों आ रही है यह दिक्कत?

समस्या की जड़ 'इलेक्ट्रिक व्हीकल' (EV) की ओर तेजी से हो रहा शिफ्ट है। ट्रेडिशनल ऑटो मैन्युफैक्चरिंग मैकेनिकल स्किल्स पर आधारित थी, लेकिन EV इकोसिस्टम के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स और मेकाट्रोनिक्स की गहरी समझ जरूरी है। छोटे मैन्युफैक्चरर्स, जो पहले से ही टाइट बजट पर काम कर रहे हैं, उनके लिए ऑटोमेशन या वर्कर को अपस्किल (Upskill) करने के लिए निवेश करना मुश्किल हो रहा है।

फाइनेंशियल इम्पैक्ट

FY26 में ऑटो-कंपोनेंट इंडस्ट्री का टर्नओवर ₹7.60 लाख करोड़ रहा, जिसमें 12.7% की ग्रोथ दिखी। लेकिन, इसके साथ ही $1.37 बिलियन का ट्रेड डेफिसिट भी दर्ज हुआ है। यह घाटा मुख्य रूप से EV पार्ट्स के इंपोर्ट पर निर्भरता के कारण है। जानकारों का मानना है कि अगर हमें 2040 तक 72 लाख नौकरियों का लक्ष्य हासिल करना है, तो बैटरी लोकलाइजेशन को 50% तक ले जाना होगा।

निवेशकों के लिए राय

निवेशकों को अब कंपनियों की सप्लाई चेन रेजिलिएंस और उनके प्रोडक्शन टारगेट पर नजर रखने की जरूरत है। हालांकि कंपनियां ऑटोमेशन का सहारा ले रही हैं, लेकिन इन अपडेट्स की लागत और स्पेशलाइज्ड इंजीनियर्स की कमी के चलते आने वाली तिमाहियों में कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन पर दबाव दिख सकता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.