Niti Aayog ने हाल ही में ट्रांसपोर्ट सेक्टर को डीकार्बोनाइज़ करने की दिशा में एक अहम सुझाव दिया है। इसके तहत, फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल (FFVs) और कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) वाले वाहनों को 'ज़ीरो एमिशन व्हीकल' (ZEV) की कैटेगरी में शामिल करने की बात कही गई है। इस प्रस्ताव पर भारतीय ऑटोमोबाइल कंपनियों में जोरदार मतभेद उभर आए हैं।
एक तरफ, Maruti Suzuki और Toyota Kirloskar Motor इस 'लाइफसाइकिल एमिशन' (lifecycle emissions) वाले दृष्टिकोण का समर्थन कर रहे हैं। उनका मानना है कि बायोफ्यूल और इथेनॉल जैसे स्वदेशी ईंधनों को बढ़ावा देना भारत की एनर्जी सिक्योरिटी (energy security) को मजबूत करेगा और आयात पर निर्भरता कम करेगा। यह Niti Aayog की क्लीन फ्यूल डाइवर्सिटी (clean fuel diversity) को बढ़ावा देने की व्यापक सोच से भी मेल खाता है।
वहीं, Tata Motors और Mahindra & Mahindra इस प्रस्ताव के सख्त खिलाफ हैं। वे चाहते हैं कि ZEV की परिभाषा पूरी तरह से 'टेलपाइप' (tailpipe) से निकलने वाले उत्सर्जन पर आधारित हो, जो कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत मानक है। उनका तर्क है कि ICE (Internal Combustion Engine) वाहनों को, चाहे वे किसी भी फ्यूल पर चलें, ZEV कहना तकनीकी रूप से गलत है और यह ग्लोबल ऑटोमोटिव स्टैंडर्ड्स (automotive standards) से भटक जाएगा।
यह पूरा टकराव तब हो रहा है जब भारत सरकार कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी (CAFE) III नॉर्म्स (norms) को अंतिम रूप दे रही है। ये नियम अप्रैल 2027 से मार्च 2032 तक लागू होंगे और फ्लीट-वाइड CO₂ उत्सर्जन को 88.4 ग्राम प्रति किलोमीटर तक लाने का लक्ष्य रखेंगे। इससे इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड वाहनों को और बढ़ावा मिलेगा। ZEV की परिभाषा पर यह बहस सीधे तौर पर प्रभावित करेगी कि कंपनियां इन नियमों का पालन कैसे करेंगी।
वैश्विक स्तर पर, ZEV की परिभाषा में मुख्य रूप से वो गाड़ियाँ आती हैं जिनसे टेलपाइप से कोई उत्सर्जन नहीं होता, जैसे बैटरी इलेक्ट्रिक व्हीकल (BEVs) और हाइड्रोजन फ्यूल सेल व्हीकल (FCVs)। Niti Aayog का प्रस्ताव इस वैश्विक आम सहमति से अलग है। भारत अपनी 90% तेल ज़रूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, जिससे एनर्जी सिक्योरिटी एक बड़ी चिंता है। पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक अस्थिरता (geopolitical instability) को देखते हुए, Niti Aayog का स्वदेशी बायोफ्यूल को बढ़ावा देने का कदम देश की एनर्जी इंडिपेंडेंस (energy independence) को बढ़ाने की एक अहम रणनीति मानी जा रही है।
इस 'टेक वॉर' के बीच, प्रमुख ऑटो कंपनियों के वैल्यूएशन (valuation) भी अलग-अलग रणनीतियों को दर्शाते हैं। Maruti Suzuki, जो वैकल्पिक ईंधन के पक्ष में है, का मार्केट कैप लगभग ₹4.5 ट्रिलियन और P/E रेशियो करीब 30-31 है। दूसरी ओर, Mahindra & Mahindra का मार्केट कैप लगभग ₹4.2 ट्रिलियन और P/E रेशियो 26 के आसपास है, जो मजबूत ग्रोथ दिखा रहा है। वहीं, Tata Motors के प्रदर्शन में अधिक उतार-चढ़ाव देखा गया है, जिसका P/E रेशियो अक्सर 20s के ऊपरी सिरे से 30s या नेगेटिव तक रहता है। हालिया नतीजों में इसके पैसेंजर व्हीकल सेगमेंट को घाटा हुआ है, जो टेक्नोलॉजिकल बदलावों से जुड़े फाइनेंशियल रिस्क (financial risk) को बताता है।
विश्लेषकों का मानना है कि FFVs और CBG को ZEV मानना ग्लोबल स्टैंडर्ड्स (global standards) से एक बड़ा विचलन है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय कंपनियों के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। बायोफ्यूल के 'ज़ीरो-एमिशन' स्टेटस पर भी सवाल बने हुए हैं। यदि भविष्य में बैटरी इलेक्ट्रिक व्हीकल (EVs) ही प्रमुख साबित होते हैं, तो वैकल्पिक ICE ईंधनों पर ज्यादा निर्भर कंपनियों के लिए यह एक जोखिम हो सकता है।