शिपिंग में बड़ा इजाफा, एक्सपोर्टर्स पर दबाव
यह स्थिति भारत के ऑटोमोटिव सेक्टर के लिए लॉजिस्टिक्स (logistics) की बढ़ती जटिलताओं और लागतों को दर्शाती है। लाल सागर में ईरान-इजराइल संघर्ष के चलते जहाजों को स्वेज कैनाल (Suez Canal) से गुजरने के बजाय लंबा रास्ता अपनाना पड़ रहा है। इस वजह से यूरोप पहुंचने में 18 दिनों तक का अतिरिक्त समय लग रहा है, और शिपिंग की लागत 25% से 35% तक बढ़ गई है।
Maruti Suzuki पर क्या असर?
Maruti Suzuki India (MSIL), जो कि एक बड़ी एक्सपोर्टर है, इस बढ़ी हुई लागत से अछूती नहीं है। कंपनी का एक्सपोर्ट बेस भले ही काफी बड़ा और डाइवर्सिफाइड (diversified) है, जिसमें पश्चिम एशिया का हिस्सा केवल 12.5% है, लेकिन शेयर बाजार में इसके स्टॉक (जो लगभग ₹22,350 INR पर 0.7% की गिरावट के साथ कारोबार कर रहा था) पर इन लॉजिस्टिकल बाधाओं का असर दिख रहा है। कंपनी का मार्केट कैपिटलाइजेशन (Market Capitalization) लगभग $40.2 बिलियन USD है और P/E 38.5x है।
ग्लोबल ऑटो इंडस्ट्री में भी हलचल
सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनियाभर की ऑटोमोबाइल कंपनियां भी इन दिक्कतों का सामना कर रही हैं। कुछ बड़ी ऑटो कंपनियां तो अपने कुछ व्हीकल मॉडल्स की प्रोडक्शन (production) में मामूली असर की बात कह रही हैं। यह ऑटो सप्लाई चेन की व्यापक कमजोरी को दिखाता है। जहाँ Continental AG और ZF Friedrichshafen जैसी कंपनियां अपने ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग नेटवर्क के कारण प्रोडक्शन या सोर्सिंग में आसानी से बदलाव कर सकती हैं, वहीं भारतीय कंपोनेंट सप्लायर्स (component suppliers) के लिए यह चुनौती ज्यादा गंभीर हो सकती है।
भू-राजनीतिक तनाव और मार्जिन पर खतरा
2020 की शुरुआत में कोविड-19 के कारण सप्लाई चेन में आई रुकावटों के वक्त भारतीय ऑटो स्टॉक्स में 25% से 35% की गिरावट आई थी। हालांकि अभी बाजार की प्रतिक्रिया धीमी है, लेकिन डिलीवरी में देरी और इंश्योरेंस प्रीमियम (insurance premium) बढ़ने का खतरा बना हुआ है। ऑटोमोटिव कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ACMA) ने भी इन दबावों को स्वीकार किया है और सरकार से हस्तक्षेप की मांग कर रहा है।
भविष्य का परिदृश्य
कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स के लिए, खासकर जो यूरोपियन क्लाइंट्स को सख्त प्रोडक्शन शेड्यूल (production schedule) के तहत सप्लाई करते हैं, यह अतिरिक्त ट्रांजिट टाइम (transit time) और शिपिंग खर्च सीधे तौर पर उनके प्रॉफिट मार्जिन (profit margin) को कम कर सकता है। कंटेनर की उपलब्धता भी एक बड़ी चिंता का विषय है, जिससे आगे और देरी हो सकती है। अगर बढ़ी हुई लागत को सीधे ग्राहकों पर नहीं डाला जा सका, तो यह भारत के कंपोनेंट सेक्टर की प्रॉफिटेबिलिटी के लिए सीधा खतरा बन सकता है।