FY26 में इंडिया के ऑटो कंपोनेंट सेक्टर ने **12.7%** की ग्रोथ दर्ज की, लेकिन इंपोर्ट (Imports) एक्सपोर्ट (Exports) से तेज़ी से बढ़े, जिसके चलते ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) **$1.37 अरब** पर पहुंच गया। जहां व्हीकल मैन्युफैक्चरर्स (OEMs) को सप्लाई मजबूत बनी हुई है, वहीं चीन, जापान और जर्मनी से कंपोनेंट्स पर ज़्यादा निर्भरता घरेलू व्यापार संतुलन पर दबाव बना रही है।
ऑटो कंपोनेंट सेक्टर का टर्नओवर बढ़ा
वित्तीय वर्ष 2026 में भारतीय ऑटो कंपोनेंट इंडस्ट्री के टर्नओवर में 12.7% का इजाफा हुआ है। पैसेंजर, कमर्शियल और टू-व्हीलर सेगमेंट में ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स (OEMs) को हुई बिक्री में 16.3% की वृद्धि ने इस विस्तार को सहारा दिया। साथ ही, भारतीय सड़कों पर वाहनों की बढ़ती संख्या के चलते आफ्टरमार्केट (Aftermarket) यानी मरम्मत और रखरखाव सेवाओं में भी 9% का ग्रोथ देखने को मिला।
इंपोर्ट का दबाव और ट्रेड इम्बैलेंस
घरेलू उत्पादन में वृद्धि के बावजूद, सेक्टर को बाहरी व्यापार में एक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा। भारतीय कंपोनेंट्स के एक्सपोर्ट में 5% की बढ़ोतरी हुई, जिसका मुख्य कारण यूरोपीय बाजारों की मांग और नए व्यापार समझौते रहे। वहीं, इंपोर्ट में लगभग 13% की काफी तेज़ वृद्धि देखी गई। इंपोर्ट और एक्सपोर्ट के इस बड़े गैप के कारण साल के लिए ट्रेड डेफिसिट $1.37 अरब तक पहुंच गया।
इन इंपोर्ट्स का लगभग 56% हिस्सा ड्राइव ट्रांसमिशन, स्टीयरिंग और इंजन पार्ट्स का है, जो मुख्य रूप से चीन, जापान और जर्मनी से मंगाए जाते हैं। निवेशकों के लिए, यह निर्भरता दर्शाती है कि भारतीय सेक्टर अपनी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता का विस्तार तो कर रहा है, लेकिन हाई-वैल्यू या स्पेशलाइज्ड कंपोनेंट्स के लिए अभी भी अंतरराष्ट्रीय सप्लायर्स पर बहुत ज्यादा निर्भर है।
सेक्टर के ट्रेंड्स और जोखिम
फिलहाल, मजबूत व्हीकल डिमांड और इंफ्रास्ट्रक्चर व कार्बन न्यूट्रेलिटी को लेकर सरकारी पहलों से घरेलू ग्रोथ को बल मिल रहा है। इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) सेगमेंट, हालांकि अभी व्यापक रूप से अपनाने के शुरुआती चरण में है, फिर भी OEMs को की गई कुल बिक्री में 4.6% का योगदान दिया।
हालांकि, यह सेक्टर एक जटिल माहौल से गुजर रहा है। पश्चिम एशिया में संघर्ष और अन्य क्षेत्रों में भू-राजनीतिक अस्थिरता जैसे वैश्विक तनावों ने सप्लाई चेन्स में अनिश्चितता पैदा कर दी है। इसके अलावा, इस स्पेस की कंपनियां बढ़ते ऑपरेशनल खर्चों, जैसे कि फ्रेट (Freight) और इंश्योरेंस (Insurance) की ऊंची लागत, और कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से भी जूझ रही हैं। रेयर अर्थ मैग्नेट (Rare Earth Magnets) जैसे स्पेशलाइज्ड इनपुट्स की सीमित उपलब्धता एक स्ट्रक्चरल (Structural) चुनौती बनी हुई है, जो हाई-टेक कंपोनेंट इंपोर्ट पर बहुत अधिक निर्भर फर्मों के प्रॉफिट मार्जिन्स (Profit Margins) को प्रभावित कर सकती है।
निवेशक इस बात पर नजर रख सकते हैं कि कंपनियां अपनी सप्लाई चेन स्ट्रैटेजी को कैसे मैनेज करती हैं और क्या वे इंपोर्ट पर निर्भरता कम करने के लिए अपने प्रोडक्ट्स में लोकल कंटेंट (Local Content) बढ़ा सकती हैं। बढ़ते EV बाजार के लिए प्रोडक्शन बढ़ाने और स्थिर सप्लाई लाइन्स सुरक्षित करने की घरेलू निर्माताओं की क्षमता आने वाली तिमाहियों में लंबी अवधि की प्रॉफिटेबिलिटी के लिए महत्वपूर्ण होगी।
