भारतीय ऑटो सहायक (Auto Ancillary) उद्योग शानदार ग्रोथ के ट्रैक पर है। अनुमान है कि वित्त वर्ष 2027 तक यह उद्योग सालाना **8-9%** की दर से बढ़ेगा और इसका कुल बाजार आकार **₹10.68 ट्रिलियन** तक पहुंच जाएगा। इलेक्ट्रिक मोबिलिटी (Electric Mobility) की बढ़ती मांग इस ग्रोथ का एक बड़ा कारण है।
क्यों दिख रही है ज़बरदस्त ग्रोथ?
'CareEdge Ratings' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय ऑटो सहायक सेक्टर निवेश-संचालित ग्रोथ के दौर में प्रवेश कर रहा है। जहां FY26 में इसका बाजार आकार लगभग ₹9,835 बिलियन था, वहीं FY27 तक यह बढ़कर ₹10,681 बिलियन होने का अनुमान है। यह उछाल घरेलू वाहन उत्पादन में मजबूती और ऑटो सप्लाई चेन में हाई-वैल्यू कंपोनेंट्स की ओर बढ़ते स्ट्रक्चरल शिफ्ट को दर्शाता है।
इस सेक्टर की ग्रोथ के पीछे तीन मुख्य फैक्टर हैं:
- ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स (OEMs) से मजबूत डिमांड।
- हर गाड़ी में लगने वाले कंपोनेंट्स की बढ़ती संख्या।
- रिप्लेसमेंट पार्ट्स के लिए एक मजबूत आफ्टरमार्केट।
इसके अलावा, सरकारी पहलों और 'चाइना प्लस वन' जैसी ग्लोबल स्ट्रेटेजी से भारतीय मैन्युफैक्चरर्स को लोकलाइजेशन (localization) बढ़ाने और ग्लोबल सप्लाई चेन में अपनी जगह बनाने में मदद मिल रही है।
इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs) का बढ़ता दबदबा
इंडस्ट्री को नया आकार देने में इलेक्ट्रॉनिक्स और क्लीन मोबिलिटी प्लेटफॉर्म्स का तेजी से अपनाना एक अहम भूमिका निभा रहा है। FY26 में भारत में इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) का पेनेट्रेशन लगभग 8.28% था, और सालाना रजिस्ट्रेशन 2.45 मिलियन यूनिट्स के पार पहुंच गया।
इस बदलाव से गाड़ियों के 'बिल ऑफ मैटेरियल्स' (bill of materials) में बड़ा फर्क आया है। अब EV की कुल लागत में बैटरीज का हिस्सा 40-50% है, और इलेक्ट्रॉनिक्स का योगदान लगभग 23% है। यह पारंपरिक इंटरनल कम्बशन इंजन (ICE) वाली गाड़ियों के मुकाबले काफी ज्यादा है, जहां यह आंकड़ा 10% से भी कम हुआ करता था। इस शिफ्ट से पावर इलेक्ट्रॉनिक्स, थर्मल मैनेजमेंट और सेमीकंडक्टर-संबंधित कंपोनेंट्स जैसे क्षेत्रों में नए रेवेन्यू के अवसर पैदा हो रहे हैं।
रेवेन्यू का गणित और जोखिम
रेवेन्यू के लिहाज से देखें तो, फिलहाल 67% आय घरेलू OEMs से आती है। एक्सपोर्ट्स (Exports) 22% और आफ्टरमार्केट (Aftermarket) 11% का योगदान देते हैं। अनुमान है कि FY27 तक एक्सपोर्ट्स लगभग ₹2.3 ट्रिलियन तक पहुंच सकते हैं।
हालांकि, इंडस्ट्री का भविष्य उज्ज्वल दिख रहा है, लेकिन निवेशकों को कुछ जोखिमों पर भी नजर रखनी होगी। रॉ मैटेरियल (Raw material) और फ्रेट प्राइसेज (freight prices) की कीमतों में उतार-चढ़ाव प्रॉफिटेबिलिटी पर असर डाल सकता है। भू-राजनीतिक (Geopolitical) डेवलपमेंट और ट्रेड पॉलिसीज (trade policies) में बदलाव भी चुनौतियां पेश कर सकते हैं। इसके अलावा, इंडस्ट्री अभी भी बैटरी सेल्स और एडवांस्ड सेमीकंडक्टर्स जैसे महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स के लिए आयात पर निर्भर है। निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनियां इन सप्लाई चेन की निर्भरताओं को कैसे मैनेज करती हैं और सॉफ्टवेयर-डिफाइंड और इलेक्ट्रिक वाहनों की बदलती तकनीकी जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने R&D प्रयासों को कितनी सफलतापूर्वक बढ़ा पाती हैं।
