Hyundai Motor India Ltd (HMIL) ने फाइनेंशियल ईयर 2026 की तीसरी तिमाही में 8% की बढ़ोतरी के साथ ₹17,973.5 करोड़ का रेवेन्यू (revenue) दर्ज किया है। कंपनी का नेट प्रॉफिट (net profit) भी 6.3% बढ़कर ₹1,234.4 करोड़ रहा, और EBITDA में 7.6% का इजाफा हुआ, जो ₹2,018.3 करोड़ पर पहुंच गया। इस शानदार प्रदर्शन का बड़ा श्रेय कंपनी के एक्सपोर्ट्स (exports) को जाता है, जिसमें 21% का ज़बरदस्त उछाल देखा गया। ये एक्सपोर्ट्स अब कंपनी की कुल बिक्री का करीब 25% हिस्सा हैं, जो मध्य पूर्व, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे बाजारों में HMIL की ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को दर्शाते हैं।
हालांकि, घरेलू बाजार (domestic market) की तस्वीर उतनी अच्छी नहीं है। कंपनी के डोमेस्टिक होलसेल वॉल्यूम (domestic wholesale volumes) में सिर्फ 0.4% की मामूली बढ़ोतरी हुई और यह 146,548 यूनिट पर ही अटक गया। यह इंडस्ट्री की ओवरऑल रिकवरी की तुलना में काफी कम है, क्योंकि इस तिमाही में ऑटो इंडस्ट्री की डोमेस्टिक बिक्री में लगभग 17.6% की बढ़ोतरी हुई थी। नतीजतन, HMIL का डोमेस्टिक मार्केट शेयर (domestic market share) घटकर 11.5% रह गया, जो पिछली तिमाही (Q1 FY25) में 14.6% था। कंपनी इस मामले में अपने राइवल्स (rivals) जैसे Maruti Suzuki (जिसका रेवेन्यू 29.2% बढ़ा) और Tata Motors (जिसके PV डिवीजन में 24% की ग्रोथ आई) से पिछड़ती दिख रही है।
इस बीच, कंपनी के मार्जिन्स (margins) पर भी दबाव देखा जा रहा है। EBITDA मार्जिन (margins) घटकर 11.2% पर आ गए। इसकी मुख्य वजहें नई पुणे प्लांट की लागत को स्थिर करना और बढ़ती कमोडिटी इन्फ्लेशन (commodity inflation) हैं। मैनेजमेंट का कहना है कि इन प्लांट से जुड़ी लागतें अगले 3-4 क्वार्टर तक मार्जिन को प्रभावित कर सकती हैं।
भविष्य की ओर देखें तो, HMIL ने फाइनेंशियल ईयर 2027 के लिए 5-6% की ग्रोथ का अनुमान जताया है, जो इंडस्ट्री के अनुमानों के लगभग बराबर है। कंपनी का लक्ष्य 2030 तक एक्सपोर्ट पेनेट्रेशन (export penetration) को 30% तक पहुंचाना है, ताकि भारत को उभरते बाजारों के लिए एक मैन्युफैक्चरिंग हब बनाया जा सके। कंपनी ने टैक्सी सेगमेंट में भी कदम रखा है, जो शुरुआती रुझान दिखा रहा है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या FY30 तक 26 नए मॉडल लॉन्च करने की योजना घरेलू बाजार में घटते शेयर पर लगाम लगा पाएगी? निवेशकों की निगाहें अगले नतीजों पर होंगी, ताकि मार्जिन स्टेबिलाइजेशन (margin stabilization) और डोमेस्टिक कॉम्पिटिटिवनेस (competitiveness) में वापसी के संकेत मिल सकें।
