GreenCell Mobility ने अपनी ई-बस फ्लीट को 4,500 बसों तक बढ़ाने के लिए Impact Fund Denmark से ₹330 करोड़ का इक्विटी फंड जुटाया है। कंपनी विस्तार तो कर रही है, लेकिन लगातार बढ़ते ऑपरेटिंग खर्च और नेट लॉस बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
बड़े विस्तार की तैयारी
GreenCell Mobility ने डेनमार्क के Impact Fund Denmark से ₹330 करोड़ की फ्रेश इक्विटी फंडिंग हासिल की है। कंपनी, जिसे Eversource Capital जैसे बड़े निवेशकों का समर्थन प्राप्त है, इस पूंजी का उपयोग 4,500 नई इलेक्ट्रिक बसें सड़कों पर उतारने के लिए करेगी। यह कदम कंपनी के उस लक्ष्य का हिस्सा है, जिसके तहत वह भारत के 105 शहरों में 5,000 से ज्यादा बसों का बेड़ा खड़ा करना चाहती है। कंपनी 'इलेक्ट्रिक मोबिलिटी-एज-ए-सर्विस' (E-Mobility-as-a-Service) मॉडल पर काम करती है।
वित्तीय चुनौतियां और दबाव
फंडिंग मिलना कंपनी के लिए अच्छी खबर है, लेकिन इसकी राह में चुनौतियां कम नहीं हैं। फाइनेंशियल ईयर 2025 में कंपनी का रेवेन्यू करीब ₹676.8 करोड़ रहा, लेकिन मुनाफा कमाने में कंपनी अभी पीछे है। इस दौरान कंपनी को ₹125.2 करोड़ का नेट लॉस हुआ है। निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि क्या कंपनी सिर्फ पूंजी जुटाने के बजाय अपने खर्चों को मैनेज कर पाएगी।
बैटरी की तकनीकी अड़चनें
मुनाफे की राह में तकनीकी बाधाएं भी खड़ी हैं। पहले इस्तेमाल की जा रही लिथियम मैंगनीज ऑक्साइड (LMO) बैटरी की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं। इन बैटरियों को बार-बार बदलने की जरूरत पड़ती है, जिससे ऑपरेटिंग कॉस्ट बढ़ गई है और सेवा में भी रुकावटें आती हैं। इसे देखते हुए कंपनी अब लिथियम आयरन फॉस्फेट (LFP) बैटरी की ओर शिफ्ट हो रही है, हालांकि यह बदलाव शॉर्ट-टर्म मार्जिन पर असर डाल रहा है।
इसके अलावा, सरकारी कॉन्ट्रैक्ट्स में देरी और डिपो हैंडओवर में सुस्ती कंपनी के कैश फ्लो पर दबाव डाल रही है। चूंकि यह एक प्राइवेट कंपनी है, इसलिए यह शेयर मार्केट में लिस्टेड नहीं है। फिलहाल, मैनेजमेंट की असली परीक्षा आने वाली तिमाहियों में नए बस डिप्लॉयमेंट की गति और बैटरी ट्रांजिशन के जरिए लागत घटाने की क्षमता पर टिकी है।
