प्रधानमंत्री के सलाहकार तरुण कपूर ने भारी कमर्शियल वाहनों को अगले **5** साल में तेजी से इलेक्ट्रिक में बदलने का लक्ष्य रखा है। हालांकि यह कदम ऊर्जा सुरक्षा के लिए अहम है, लेकिन ऑटो सेक्टर के लिए सप्लाई चेन और ऑपरेशनल चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
भारत का इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का सफर अब एक नए और अहम मोड़ पर है। SIAM के 66वें कन्वेंशन (3 सितंबर, 2026) में पीएम के सलाहकार तरुण कपूर ने साफ कर दिया है कि डीजल ट्रकों और बसों से इलेक्ट्रिक पर शिफ्ट होने की रफ्तार अब तेज करनी होगी। अगले 5 साल का समय इस बदलाव के लिए बेहद क्रिटिकल है, ताकि देश कच्चे तेल के आयात पर अपनी निर्भरता कम कर सके।
सरकार की सख्त नीति के संकेत
आने वाले दिनों में सरकार इस ट्रांजिशन को तेज करने के लिए कई सख्त फैसले ले सकती है। इसमें पुरानी और ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाली कमर्शियल गाड़ियों पर पाबंदी, टैक्स स्ट्रक्चर में बदलाव और नई सब्सिडी स्कीम्स शामिल हो सकती हैं। फिलहाल सरकार का 'PM eDRIVE' प्रोग्राम उतनी रफ्तार नहीं पकड़ पाया है, जिसके तहत 5,000 इलेक्ट्रिक ट्रकों का लक्ष्य था, लेकिन अब तक केवल 150 वाहन ही इसके दायरे में आए हैं।
सप्लाई चेन की चुनौतियां
इस बदलाव में सबसे बड़ी अड़चन 'लोकलाइजेशन' (Localization) की है। फिलहाल भारतीय कंपनियां ट्रैक्शन मोटर्स और कंट्रोलर्स के लिए चीन जैसे देशों से आने वाले 'रेयर-अर्थ मैग्नेट्स' पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं। सप्लाई चेन की दिक्कत को देखते हुए SIAM ने सरकार से लोकलाइजेशन नॉर्म्स की डेडलाइन 1 अप्रैल, 2027 तक बढ़ाने की गुहार लगाई है ताकि कंपनियां घरेलू विकल्प तैयार कर सकें।
प्राइवेट सेक्टर की तेजी
सरकारी स्कीम की सुस्ती के बीच प्राइवेट कंपनियां आगे आ रही हैं। UltraTech Cement ने दिसंबर 2026 तक 600 से ज्यादा इलेक्ट्रिक ट्रकों का बेड़ा तैयार करने की योजना बनाई है, जिसके लिए वे Tata Motors और Ashok Leyland के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। साथ ही, Energy in Motion ने अक्टूबर 2026 से 500 भारी कमर्शियल EV तैनात करने का प्रोजेक्ट शुरू किया है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
निवेशकों को कुछ जोखिमों को ध्यान में रखना चाहिए:
- पॉलिसी अनिश्चितता: सब्सिडी में अचानक बदलाव या ICE (पेट्रोल/डीजल) वाहनों पर भारी टैक्स से ऑटो कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ सकता है।
- ऑपरेशनल रिस्क: इंजन-बेस्ड मैन्युफैक्चरिंग से EV-नेटिव मॉडल्स पर स्विच करना एक बड़ी तकनीकी चुनौती है।
- सप्लाई चेन: इंपोर्टेड पुर्जों पर निर्भरता बनी रहने से प्रोडक्शन में देरी या कॉस्ट बढ़ सकती है।
