भारत सरकार ने एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल्स (ACC) के लिए प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम की डेडलाइन को दो साल बढ़ाकर **2031** कर दिया है। ग्लोबल सप्लाई चेन की दिक्कतों को देखते हुए यह फैसला लिया गया है। इससे Ola Electric और Reliance New Energy जैसी कंपनियों को बड़ी राहत मिली है, जबकि रेगुलेटरी जांच के कारण राजेश एक्सपोर्ट्स को इस एक्सटेंशन से बाहर रखा गया है।
₹18,100 करोड़ की स्कीम में बड़ा बदलाव
भारी उद्योग मंत्रालय ने ₹18,100 करोड़ की एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल्स (ACC) के लिए PLI स्कीम की समय-सीमा बढ़ाकर 2031 कर दी है। इस फैसले से Ola Electric और Reliance New Energy जैसे प्रमुख लाभार्थियों को बड़ी मदद मिलेगी, जो सप्लाई चेन की मुश्किलों के चलते तय समय-सीमा को पूरा नहीं कर पा रहे थे।
Ola Electric को ₹7,240 करोड़ का फायदा?
Ola Electric के लिए यह एक्सटेंशन खास है। कंपनी ने 12 अगस्त, 2026 को फाइलिंग में कन्फर्म किया कि इस एक्सटेंशन से उसे ₹7,240 करोड़ तक का इंसेंटिव मिल सकता है, जिसे तिमाही किश्तों में दिया जाएगा। इससे कंपनियों को एडवांस्ड बैटरी बनाने वाली जटिल मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स लगाने के लिए और वक्त मिल गया है।
राजेश एक्सपोर्ट्स बाहर, SEBI की जांच का साया
जहां ज्यादातर कंपनियों को राहत मिली है, वहीं राजेश एक्सपोर्ट्स को इस बार एक्सटेंशन नहीं मिला है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कंपनी पर सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) द्वारा गवर्नेंस और फाइनेंशियल रिपोर्टिंग को लेकर जांच चल रही है। यह दिखाता है कि सरकारी स्कीमों में भाग लेने पर रेगुलेटरी जोखिम भी हो सकता है।
मैन्युफैक्चरिंग में आ रही हैं ये दिक्कतें
भारत में बैटरी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाना काफी मुश्किल साबित हो रहा है। कंपनियों को खास मशीनरी जुटाने और कुशल टेक्निकल वर्कर्स, खासकर चीन से, हायर करने में लगातार परेशानी हो रही है। इसके अलावा, एडवांस्ड बैटरी टेक्नोलॉजी अभी भी भारत में शुरुआती स्टेज में है, जिससे शुरुआत में प्रोडक्शन बढ़ाना कठिन हो रहा है।
धीमी है सेक्टर की प्रगति
फिलहाल, यह सेक्टर अपने लक्ष्यों के मुकाबले धीमी रफ्तार से आगे बढ़ रहा है। स्कीम के तहत मूल रूप से 40 GWh की कैपेसिटी अलॉट की गई थी, जिसमें से 1.4 GWh ही अगस्त 2026 के मध्य तक चालू हुई है। यह गैप दिखाता है कि कंपनियों को डोमेस्टिक वैल्यू एडिशन (Domestic Value Addition) की कड़ी शर्तों को पूरा करने में कितनी मुश्किलें आ रही हैं, जिसके तहत बैटरी के ज्यादातर कंपोनेंट्स भारत में ही बनने चाहिए।
निवेशकों के लिए आगे क्या?
निवेशकों को अब कंपनियों की आने वाली प्रोजेक्ट कमीशनिंग की टाइमलाइन और इन यूनिट्स के लिए जरूरी हाई कैपिटल एक्सपेंडिचर को मैनेज करने की क्षमता पर नजर रखनी चाहिए। यह देखना अहम होगा कि कंपनियां सप्लाई चेन के रिस्क को कैसे मैनेज करती हैं और आने वाले सालों में पूरे इंसेंटिव अमाउंट के लिए लोकल मैन्युफैक्चरिंग की सख्त शर्तों को कैसे पूरा करती हैं।
