Ministry of Heavy Industries ने ऑटो कंपनियों को **60** प्रमुख हाई-वे कॉरिडोर पर EV चार्जिंग स्टेशन बनाने और उनके रखरखाव की जिम्मेदारी सौंपी है। यह कदम सरकारी सब्सिडी से हटकर उद्योग-आधारित बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की दिशा में है।
भारत सरकार ने अब ऑटोमोबाइल निर्माताओं को देश भर में इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर को विकसित करने और उसे मेंटेन करने का मुख्य जिम्मा सौंप दिया है। 3 सितंबर, 2026 को Society of Indian Automobile Manufacturers (SIAM) के वार्षिक सत्र में Ministry of Heavy Industries ने यह प्रस्ताव रखा कि ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स (OEMs) अब खुद 60 चुनिंदा हाई-वे कॉरिडोर पर चार्जिंग नेटवर्क का प्रबंधन करेंगे।
क्यों लिया गया यह सख्त फैसला?
यह बदलाव इसलिए जरूरी हो गया क्योंकि मौजूदा चार्जिंग नेटवर्क में विश्वसनीयता (Reliability) की भारी कमी है। मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, फिलहाल मैप्ड पब्लिक चार्जिंग स्टेशनों में से करीब 50% अक्सर बंद रहते हैं, जो लंबी दूरी की इलेक्ट्रिक यात्रा में सबसे बड़ी बाधा हैं। अब यह जिम्मेदारी कंपनियों पर होने से उम्मीद है कि चार्जिंग पॉइंट न केवल लगेंगे, बल्कि वे हमेशा चालू भी रहेंगे।
सब्सिडी से इन्फ्रास्ट्रक्चर की ओर कदम
सरकार अब EV पर दी जाने वाली सीधी सब्सिडी (Purchase Subsidies) से धीरे-धीरे बाहर निकल रही है। इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर जैसे सेगमेंट अब स्थिर हो रहे हैं, ऐसे में सरकार ने EV इकोसिस्टम के लिए ₹2,000 करोड़ का फंड अलग रखा है। यह पूंजी उन कंपनियों को मिलेगी जो हाईवे रूट पर चार्जिंग डिपो बनाने और उन्हें चालू रखने का जिम्मा उठाएंगी।
निवेशकों के लिए क्या मायने हैं?
शेयरधारकों के लिए यह नीति एक बड़ा बदलाव है। अब तक ऑटो कंपनियां सिर्फ गाड़ियां बेचने पर ध्यान देती थीं, लेकिन अब उन्हें सर्विस नेटवर्क मैनेज करने की जिम्मेदारी भी उठानी होगी। इससे कंपनी के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है, क्योंकि इंस्टॉलेशन और मेंटेनेंस का खर्च सीधे उनके मुनाफे को प्रभावित करेगा। देखना यह होगा कि कंपनियां इन प्रोजेक्ट्स के लिए फंड कैसे जुटाती हैं और क्या वे खुद का नेटवर्क खड़ा करती हैं या एनर्जी कंपनियों के साथ पार्टनरशिप करेंगी। इन 60 हाईवे कॉरिडोर का इलेक्ट्रिफिकेशन कितनी जल्दी पूरा होता है, यह ऑटो सेक्टर के बड़े सुधार का संकेत होगा।
