Volkswagen, BMW और Mercedes-Benz जैसे दिग्गज अब अपना प्रोडक्शन यूरोप से भारत शिफ्ट कर रहे हैं। EU के महंगे एनर्जी खर्च और कार्बन टैक्स से बचने के लिए कंपनियों ने पिछले **30 महीनों** में भारत में **$7.4 बिलियन** का भारी निवेश किया है, जो भारतीय ऑटो-कंपोनेंट सप्लायर्स के लिए एक बड़ा गेम चेंजर साबित हो सकता है।
यूरोप की मुश्किल, भारत के लिए बड़ा मौका
यूरोपीय संघ (EU) के नए 'कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म' और सख्त एनवायरमेंटल रेगुलेशंस के कारण जर्मनी की बड़ी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए यूरोप में प्रोडक्शन जारी रखना महंगा साबित हो रहा है। यही वजह है कि अब ये कंपनियां भारत को न केवल अपने घरेलू बाजार के लिए, बल्कि ग्लोबल एक्सपोर्ट बेस के रूप में देख रही हैं।
बड़े निवेश और बढ़ता दायरा
वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने पुष्टि की है कि Volkswagen, Mercedes-Benz, BMW और Audi जैसी कंपनियां भारत में अपना कामकाज तेजी से बढ़ा रही हैं। भारत के राजदूत अजित गुप्ते के अनुसार, जर्मन फर्मों ने पिछले 30 महीनों में $7.4 बिलियन का निवेश किया है। सिर्फ ऑटोमोबाइल ही नहीं, बल्कि डिफेंस, एयरोस्पेस और प्रिसिजन इंजीनियरिंग सेक्टर में भी इनका रुझान बढ़ रहा है।
भारतीय निवेशकों के लिए 'गोल्डन चांस'
इस बदलाव का सबसे ज्यादा फायदा उन ऑटो-एन्सिलरी और प्रिसिजन इंजीनियरिंग कंपनियों को होगा, जो इन ग्लोबल जायंट्स की सप्लाई चेन का हिस्सा हैं। Bosch, Motherson Sumi, Schaeffler India और Bharat Forge जैसी कंपनियों के लिए नए ऑर्डर्स और बिजनेस का बड़ा रास्ता खुल सकता है।
2027 तक बड़ा बदलाव
भारत और EU के बीच प्रस्तावित 'फ्री ट्रेड एग्रीमेंट' (जो 2027 तक लागू हो सकता है) एक बड़ा कैटलिस्ट साबित होगा। हालांकि, इंफ्रास्ट्रक्चर की चुनौतियां और कुशल वर्कफोर्स की मांग जैसी बाधाएं अभी भी बरकरार हैं। निवेशकों को अब इन प्रोजेक्ट्स की टाइमलाइन और ऑटो-एन्सिलरी कंपनियों के नए एक्सपोर्ट ऑर्डर्स पर कड़ी नजर रखनी चाहिए।
