इलेक्ट्रिक गाड़ियां (EVs) पारंपरिक पेट्रोल-डीजल गाड़ियों के मुकाबले काफी भारी हो रही हैं, जिससे इंफ्रास्ट्रक्चर पर दबाव बढ़ रहा है। इस समस्या से निपटने के लिए भारत सरकार अब 'सर्कुलर इकोनॉमी' पर दांव लगा रही है ताकि पुरानी बैटरी को रीपरपज (repurpose) किया जा सके।
यूरोपीय संघ के 2020-2025 के आंकड़े एक गंभीर इंजीनियरिंग चुनौती की ओर इशारा कर रहे हैं। बैटरी-इलेक्ट्रिक गाड़ियां (BEVs) का औसत वजन 1,878 किलो दर्ज किया गया है, जो पेट्रोल-डीजल गाड़ियों से लगभग 399 किलो ज्यादा है। प्लग-इन हाइब्रिड गाड़ियां (PHEVs) तो और भी भारी हैं, जिनका औसत वजन 1,974 किलो है। इस भारी वजन का मुख्य कारण बड़ी बैटरी पैक हैं; इंडस्ट्री का अनुमान है कि हर 10 kWh की अतिरिक्त बैटरी क्षमता गाड़ी के वजन में करीब 100 किलो का इजाफा कर देती है।
इंफ्रास्ट्रक्चर पर क्या असर पड़ेगा?
गाड़ियों का बढ़ता वजन केवल एक इंजीनियरिंग का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सड़कों, पुलों और पार्किंग स्ट्रक्चर के लिए भी चिंता का विषय है। भारी गाड़ियों के कारण टायर ज्यादा घिसते हैं और सड़कों की उम्र भी कम होती है। ऑटो कंपनियों के लिए अब असली चुनौती यह है कि वे बैटरी की एनर्जी डेंसिटी (Energy Density) को कैसे बढ़ाएं ताकि गाड़ी का वजन न बढ़े, क्योंकि वजन और कॉस्ट का सीधा असर उनके प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ता है।
भारत का 'सर्कुलर इकोनॉमी' मॉडल
केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने इस दिशा में स्पष्ट रूप से 'सर्कुलर इकोनॉमी' पर जोर दिया है। सरकार का मकसद पुरानी EV बैटरी को फेंकने के बजाय उन्हें घरों में बिजली स्टोरेज के लिए इस्तेमाल करना है। इससे न केवल कचरा कम होगा, बल्कि EV को अपनाना भी सस्ता हो जाएगा, जो भारतीय जैसे प्राइस-सेंसिटिव मार्केट के लिए बेहद जरूरी है।
साथ ही, 'रेट्रोफिटिंग' का बाजार भी तेज़ी से उभर रहा है। इसमें पुरानी गाड़ियों के फ्रेम को बचाकर सिर्फ इंजन को बैटरी से बदल दिया जाता है, जिससे नई गाड़ियों के उत्पादन पर निर्भरता कम होती है। निवेशकों के लिए अब यह देखना अहम होगा कि सरकार बैटरी रीसाइक्लिंग और रिपर्पजिंग को लेकर आगे क्या नीतियां लाती है।
