ग्लोबल इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) मार्केट में फरवरी 2026 एक बड़े बदलाव का गवाह बना। तेज़ ग्रोथ के बजाय, यह अब एक मुश्किल, प्राइस-सेंसिटिव दौर में पहुँच गया है। जहाँ पश्चिमी देश बदले हुए इंसेंटिव और ग्राहकों की लागत पर पैनी नज़र के चलते परेशान हैं, वहीं चीनी कार निर्माता एक्सपोर्ट के ज़रिए अपनी पैठ बढ़ा रहे हैं।
पॉलिसी बदलावों से बड़ा झटका
दुनिया भर में EV रजिस्ट्रेशन फरवरी में 11% घटकर 10 लाख यूनिट से कुछ ज़्यादा रह गए। यह फरवरी 2024 के बाद की सबसे कम वॉल्यूम है। इस बड़ी गिरावट की जड़ें सरकारी पॉलिसी में आए बदलाव हैं। दुनिया के सबसे बड़े EV मार्केट, चीन में रजिस्ट्रेशन में 32% की भारी गिरावट आई है। यह पिछले कई सालों में सबसे बड़ी गिरावट है। इसकी वजह 2025 के अंत में एक व्यापक परचेज टैक्स एग्ज़ेम्प्शन (tax exemption) का खत्म होना और ट्रेड-इन सब्सिडियों में कमी है, जिसने खरीदारों की सामर्थ्य को प्रभावित किया है।
उधर, नॉर्थ अमेरिका का EV मार्केट भी 35% सिकुड़ गया, जो लगातार पांचवां महीना है। इस slump का सीधा संबंध सितंबर 2025 में अमेरिकी फेडरल EV टैक्स क्रेडिट्स के बंद होने और प्रस्तावित रेगुलेटरी बदलावों से है।
यूरोप में ग्रोथ, चीन के एक्सपोर्ट में उछाल
इस बड़ी गिरावट के बावजूद, यूरोप EV सेल्स में 21% की ग्रोथ के साथ एक अहम इलाका बनकर उभरा है। जर्मनी और स्पेन जैसे देशों में चल रहे रेगुलेटरी मैंडेट्स और रिन्यूड सब्सिडियों ने इसे सहारा दिया है।
दूसरे मार्केट्स को देखें तो 'रेस्ट ऑफ द वर्ल्ड' में EV रजिस्ट्रेशन में 78% का ज़बरदस्त उछाल देखा गया। इस ग्रोथ का श्रेय टारगेटेड इंसेंटिव्स और चीनी मैन्युफैक्चरर्स के बढ़ते एक्सपोर्ट को जाता है। डोमेस्टिक मार्केट में ओवरकैपेसिटी और कड़ी प्राइस वॉर से जूझ रहे चीनी ऑटोमेकर अब एक्सपोर्ट पर ज़ोर दे रहे हैं।
नवंबर 2025 में ही चीन के EV एक्सपोर्ट 87% बढ़ गए थे, जिससे चीन एक बड़ा ग्लोबल एक्सपोर्ट हब बन गया है। मेक्सिको जैसे देश अब नॉर्थ अमेरिका के लिए एक ज़रूरी गेटवे बन गए हैं, जो ज़्यादा बेहतर ट्रेड पॉलिसीज़ का फायदा उठा रहे हैं। यह एक्सपोर्ट ड्राइव चीनी कंपनियों को डोमेस्टिक मार्केट के प्रेशर से निपटने और गिरते प्रॉफिट मार्जिन को ऑफसेट करने में मदद कर रही है।
ऑटोमेकर्स पर दबाव
EV मार्केट की मौजूदा चाल सरकारी नीतियों पर बहुत ज़्यादा निर्भर है, जो इसमें अस्थिरता ला रही है। चीन और नॉर्थ अमेरिका में आई भारी गिरावट साफ दिखाती है कि इंसेंटिव हटने पर डिमांड कितनी तेज़ी से गिर सकती है।
इस वजह से Ford, General Motors और Stellantis जैसी बड़ी ऑटोमेकर कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। इन कंपनियों ने EV से जुड़े $70 अरब से ज़्यादा के writedowns रिपोर्ट किए हैं, और कुछ हाइब्रिड व्हीकल की ओर लौटने पर विचार कर रही हैं।
चीन से बढ़ते एक्सपोर्ट से कम्पटीशन और ट्रेड फ्रिक्शन बढ़ेगा। जनवरी 2026 से लागू होने वाले नए लाइसेंस नियमों का मकसद इस फ्लो को कंट्रोल करना है, लेकिन इससे बाज़ार तक पहुँचने में दिक्कतें आ सकती हैं।
2026 में ग्लोबल EV सेल्स ग्रोथ के धीमे पड़ने की उम्मीद है। अनुमान है कि सेल्स 15.7% बढ़कर 23.9 मिलियन यूनिट तक पहुँच सकती है, जो पिछले सालों की तुलना में काफी धीमी रफ्तार है। यूरोप में 29% की बढ़त के साथ 5.15 मिलियन यूनिट की बिक्री का अनुमान है।
चीनी ऑटोमेकर का बढ़ता ग्लोबल फुटप्रिंट, खासकर उभरते मार्केट्स में, कम्पटीशन को और बदलेगा। पुरानी ऑटोमेकर कंपनियों को अब अपने प्रोडक्ट लाइनअप और कॉस्ट स्ट्रक्चर को एडजस्ट करना पड़ेगा ताकि वे चीन के सस्ते वाहनों और संभावित ट्रेड बैरियर्स से मुकाबला कर सकें।
