फ्यूल बचाने के चक्कर में कहीं जेब न खाली हो जाए!
आजकल भारतीय ग्राहकों के बीच इलेक्ट्रिक गाड़ियां (EVs) काफी लोकप्रिय हो रही हैं। हर महीने ₹5,000 तक की फ्यूल बचत और कम सर्विसिंग के कारण ये आकर्षक लगती हैं। लेकिन, एक छोटा सा शहर का एक्सीडेंट भी आपके हिसाब-किताब को पूरी तरह बिगाड़ सकता है। अगर कार के अहम हिस्से जैसे बैटरी, इन्वर्टर या हाई-वोल्टेज सिस्टम में खराबी आ जाए, तो मरम्मत का खर्चा ₹4 से ₹6 लाख तक जा सकता है। यह खर्चा किसी आम पेट्रोल-डीज़ल कार के मुकाबले बहुत ज्यादा है, जिसके पुर्जे आसानी से मिल जाते हैं और जिनकी मरम्मत भी आम है।
Dinesh Mosamkar, जो TATA AIG General Insurance में सीनियर VP हैं, बताते हैं कि जहां ट्रेडिशनल कारों का रनिंग कॉस्ट ज्यादा होता है, वहीं एक्सीडेंट से जुड़े खर्चे एक तय दायरे में रहते हैं। EVs का रनिंग कॉस्ट कम है, पर एक्सीडेंट के बाद की मरम्मत का बिल बहुत बड़ा और अप्रत्याशित हो सकता है। Naval Goel, CEO of PolicyX.com, के अनुसार, EV की बैटरी ही उसकी कुल कीमत का बड़ा हिस्सा होती है, और इसकी खास मरम्मत की ज़रूरत लागत को और बढ़ा देती है। अक्सर, EV के आम पुर्जों की मरम्मत का खर्चा, आम कार के पुर्जों से कई गुना ज्यादा होता है।
EV का इंश्योरेंस क्यों है महंगा?
EVs के इस बढ़े हुए रिस्क की वजह से, इनका इंश्योरेंस प्रीमियम भी आम कारों से ज्यादा होता है। इंश्योरेंस कंपनियां बैटरी जैसे महंगे पुर्जों की लागत और अभी भी विकसित हो रहे मरम्मत इकोसिस्टम को ध्यान में रखती हैं, जिससे जोखिम ज्यादा माना जाता है। वैसे तो कॉम्प्रिहेंसिव पॉलिसी में एक्सीडेंट, आग या चोरी कवर होती है, पर यह अक्सर बैटरी के डिग्रेडेशन, अंदरूनी खराबी या पानी से होने वाले नुकसान को कवर नहीं करती। यह एक बड़ा अंतर है, जो आम कारों के साथ कम देखने को मिलता है। ऐसे में, डिटक्टिबल और डेप्रिसिएशन के कारण ओनर्स को महंगी EV पार्ट्स के लिए अपनी जेब से काफी भुगतान करना पड़ सकता है। एक हालिया रिपोर्ट बताती है कि EV इंश्योरेंस प्रीमियम आम कारों के मुकाबले 15-30% तक ज्यादा हो सकते हैं।
मरम्मत इकोसिस्टम की चुनौतियां बढ़ा रही हैं लागत
EVs की मरम्मत का महंगा और अनिश्चित खर्च का सबसे बड़ा कारण बैटरी पैक है, जो सबसे महंगा पुर्जा होता है। एक प्रीमियम EV की बैटरी बदलने में ₹8-15 लाख तक लग सकते हैं, जो अक्सर 5 साल पुरानी आम कार की कुल कीमत से भी ज्यादा है। आम कारों के इंजन के विपरीत, EV बैटरी का रिप्लेसमेंट या बड़ी मरम्मत जल्दी ही 'टोटल लॉस' की कैटेगरी में आ सकती है। भारत में EV रिपेयर नेटवर्क अभी शुरुआती दौर में है, और हाई-वोल्टेज सिस्टम के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित टेक्नीशियन नहीं हैं। इस कमी के कारण मरम्मत की दुकानों में कॉम्पिटिशन कम है और लेबर कॉस्ट बढ़ जाती है। खास टूल्स और डायग्नोस्टिक इक्विपमेंट भी कम हैं, जिससे देरी होती है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि जब तक मरम्मत नेटवर्क और ट्रेनिंग में सुधार नहीं होता, EV रिपेयर कॉस्ट अप्रत्याशित बनी रहेगी, जिससे मालिकों और इंश्योरर्स दोनों के लिए रिस्क बना रहेगा।
अपने EV निवेश को सुरक्षित कैसे करें?
इन संभावित वित्तीय झटकों से बचने के लिए, एक्सपर्ट्स कुछ खास इंश्योरेंस 'ऐड-ऑन' (add-ons) की सलाह देते हैं। बैटरी प्रोटेक्शन कवर सबसे जरूरी है, जो बैटरी से जुड़े बड़े खर्चों से बचाता है। इसके अलावा, जीरो डेप्रिसिएशन कवर (Zero Depreciation Cover) भी ज़रूरी है, जिससे पुर्जों की पूरी कीमत वापस मिलती है। रिटर्न-टू-इनवॉइस (Return-to-Invoice) कवर, अगर गाड़ी टोटल लॉस हो जाए तो मूल खरीद कीमत का भुगतान करता है। रोडसाइड असिस्टेंस (Roadside Assistance) भी ज़रूरी है, क्योंकि EV-सर्टिफाइड सर्विस सेंटर कम हैं। साथ ही, कंज्यूमेबल्स कवर (Consumables Cover) भी कुछ ऐसे खर्चों को कवर करता है जो स्टैंडर्ड क्लेम में शामिल नहीं होते।
भविष्य का नज़रिया
ऑटो इंडस्ट्री को उम्मीद है कि जैसे-जैसे EV टेक्नोलॉजी बेहतर होगी और प्रोडक्शन बढ़ेगा, बैटरी और मरम्मत की लागत धीरे-धीरे कम हो सकती है। हालांकि, EV रिपेयर की खास प्रकृति बनी रहेगी, जिसके लिए ट्रेनिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर में लगातार निवेश की ज़रूरत होगी। इंश्योरेंस कंपनियां भी EVs के लिए अपने अंडरराइटिंग मॉडल को बेहतर बनाएंगी, जिससे कीमतों में और भी ज़्यादा कस्टमाइजेशन देखने को मिल सकता है। ग्राहकों को इन छिपे हुए खर्चों को समझना होगा और समझदारी से इंश्योरेंस ऐड-ऑन का इस्तेमाल करके EV के टोटल कॉस्ट ऑफ ओनरशिप (Total Cost of Ownership) को मैनेज करना होगा।
