भारत में इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs) खरीदने का नया तरीका, बैटरी-एज-ए-सर्विस (BaaS), अब लोगों को लुभा रहा है। ये मॉडल गाड़ी की शुरुआती कीमत तो कम कर देते हैं, लेकिन मंथली सब्सक्रिप्शन फीस और तय किलोमीटर की शर्त के कारण कई सालों में कुल खर्च बढ़ सकता है। इन्वेस्टर्स को इस पर नज़र रखनी चाहिए कि यह मॉडल ग्राहकों की मांग और ऑटो कंपनियों के मुनाफे को कैसे प्रभावित करता है।
बैटरी-एज-ए-सर्विस (BaaS) का बढ़ता चलन
भारत में इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs) की खरीद-फरोख्त का तरीका बदल रहा है। अब 'बैटरी-एज-ए-सर्विस' (BaaS) मॉडल अपनाया जा रहा है। इस मॉडल में, गाड़ी की बैटरी की कीमत को गाड़ी से अलग कर दिया जाता है। इससे कंपनियों के लिए EV की शुरुआती एक्स-शोरूम कीमत काफी कम हो जाती है, और ये आम ग्राहकों के लिए ज़्यादा किफायती हो जाती हैं। एक ऐसी गाड़ी, जिसकी कीमत लगभग ₹10 लाख होनी चाहिए, उसकी शुरुआती कीमत काफी कम हो जाती है, जिससे वो पेट्रोल-डीजल वाली गाड़ियों के मुकाबले में आ जाती है।
असली ओनरशिप कॉस्ट का हिसाब
शुरुआती कम कीमत ग्राहकों को आकर्षित तो करती है, लेकिन सब्सक्रिप्शन मॉडल की असली गणित थोड़ी पेचीदा है। BaaS मॉडल में, गाड़ी के मालिक को गाड़ी चलाने की दूरी के हिसाब से हर महीने एक फीस देनी होती है। यह फीस आमतौर पर ₹2.3 से लेकर ₹5 प्रति किलोमीटर के बीच होती है। अगर कोई औसत ग्राहक साल भर में 15,000 किलोमीटर गाड़ी चलाता है और ₹4 प्रति किलोमीटर के हिसाब से भुगतान करता है, तो सिर्फ बैटरी सब्सक्रिप्शन पर हर साल ₹60,000 का खर्चा आता है। पांच साल में यह अतिरिक्त खर्च बढ़कर ₹3 लाख तक पहुँच सकता है, जिसमें टैक्स और सब्सक्रिप्शन रेट में भविष्य में होने वाली बढ़ोतरी शामिल नहीं है।
मिनिमम यूसेज की झंझट
कई सब्सक्रिप्शन प्लान्स में हर महीने गाड़ी चलाने की एक न्यूनतम सीमा (minimum usage requirement) तय होती है। उदाहरण के लिए, कुछ प्लान्स में ग्राहकों को हर महीने 1,800 या 2,000 किलोमीटर गाड़ी चलाने के पैसे देने होते हैं, भले ही उन्होंने उतनी दूरी तय की हो या नहीं। इसका मतलब है कि अगर ग्राहक तय की गई दूरी से कम गाड़ी चलाता है, तो भी उसे पूरी फीस भरनी होगी। ऐसे में, प्रति किलोमीटर का खर्च असल में बढ़ जाता है। यह स्थिति ग्राहकों के लिए एक वित्तीय जोखिम पैदा करती है, जहाँ लंबे समय में गाड़ी का कुल खर्च, शुरुआती खरीद कीमत में हुई बचत से ज़्यादा हो सकता है।
ऑटो कंपनियों के लिए रणनीति में बदलाव
कीमतों के प्रति संवेदनशील भारतीय बाज़ार में मांग बढ़ाने के लिए ऑटोमोबाइल कंपनियां इन फाइनेंसिंग टूल्स का सहारा ले रही हैं। Tata Motors और JSW MG Motor India जैसी कंपनियों ने पेट्रोल-डीजल गाड़ियों से मुकाबला करने के लिए ये विकल्प पेश किए हैं। JSW MG Motor India का कहना है कि ज़्यादा गाड़ी चलाने वाले ग्राहकों के लिए, ये प्लान पारंपरिक ईंधन की तुलना में हर महीने बचत दे सकते हैं। हालांकि, कंपनी यह भी मानती है कि यह मॉडल उनकी कुल बिक्री का सिर्फ एक हिस्सा है।
इन्वेस्टर्स के नज़रिए से, BaaS मॉडल की सफलता ग्राहकों द्वारा इसे लगातार अपनाने पर निर्भर करती है। हालांकि यह अल्पावधि में यूनिट बिक्री बढ़ाने में मदद करता है, लेकिन यह कंपनियों के लिए पारंपरिक सीधी बिक्री की तुलना में एक अलग तरह का रेवेन्यू स्ट्रीम बनाता है। इन्वेस्टर्स के लिए महत्वपूर्ण बातें यह होंगी कि इन प्लान्स को कितने ग्राहक अपना रहे हैं, कंपनी के प्रॉफिट मार्जिन पर इसका क्या असर पड़ रहा है, और क्या ये सब्सक्रिप्शन-आधारित मॉडल ग्राहकों की वफादारी बढ़ाते हैं या फिर कुल लागत ज़्यादा होने पर ग्राहकों की नाराजगी का कारण बनते हैं।
