E20 पेट्रोल से माइलेज पर असर? गडकरी बोले - डीलर टेस्ट पर करें भरोसा, 3-5% तक घट सकती है फ्यूल एफिशिएंसी

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
E20 पेट्रोल से माइलेज पर असर? गडकरी बोले - डीलर टेस्ट पर करें भरोसा, 3-5% तक घट सकती है फ्यूल एफिशिएंसी

सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने साफ कर दिया है कि E20 पेट्रोल (जिसमें 20% इथेनॉल होता है) के इस्तेमाल से कार के डैशबोर्ड पर दिखने वाला माइलेज उतना भरोसेमंद नहीं है। सरकार ने भी माना है कि इस नए ईंधन से फ्यूल एफिशिएंसी में **3% से 5%** तक की कमी आ सकती है, लेकिन इसके पीछे देश के कच्चे तेल के आयात को कम करने और प्रदूषण घटाने जैसे बड़े लक्ष्य हैं।

डीलर टेस्ट पर भरोसा क्यों?

सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने E20 पेट्रोल को लेकर ग्राहकों की चिंताओं पर जवाब दिया है। उन्होंने कहा कि जो लोग E20 पेट्रोल इस्तेमाल करने के बाद अपनी कारों के माइलेज में कमी महसूस कर रहे हैं, उन्हें कार के डैशबोर्ड पर दिख रहे आंकड़ों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। मंत्री के मुताबिक, सही मायलेज जानने के लिए अधिकृत सर्विस सेंटरों पर होने वाले खास टेस्ट पर निर्भर रहना चाहिए, क्योंकि ये टेस्ट सटीक जानकारी देते हैं।

सरकार ने स्वीकारी माइलेज में कमी की बात

पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने आधिकारिक तौर पर यह स्वीकार किया है कि E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से कुछ गाड़ियों के मॉडल में फ्यूल इकोनॉमी 3% से 5% तक कम हो सकती है। इसके बावजूद, सरकार का कहना है कि इथेनॉल-ब्लेंडेड पेट्रोल प्रोग्राम (Ethanol Blended Petrol Programme) देश की ऊर्जा रणनीति का अहम हिस्सा है। इसका मुख्य मकसद कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना और गाड़ियों से होने वाले उत्सर्जन (emissions) को घटाना है, जिसे माइलेज में मामूली कमी से ज्यादा अहम माना जा रहा है।

आम आदमी और ऑटो इंडस्ट्री पर असर

जब से पूरे देश में E20 पेट्रोल अनिवार्य हुआ है, कई वाहन मालिकों ने माइलेज में गिरावट महसूस की है। सरकार भले ही इसे ऊर्जा स्वतंत्रता की दिशा में एक कदम बता रही हो, लेकिन इस बदलाव से ऑटो सेक्टर के लिए कुछ चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। खासकर पुरानी गाड़ियां, जिन्हें ज़्यादा इथेनॉल मिश्रण को संभालने के लिए डिज़ाइन नहीं किया गया था, उन्हें परफॉरमेंस में दिक्कत आ सकती है। मैन्युफैक्चरर्स ने पहले भी यह चिंता जताई थी कि E20 का इंजन के पुर्जों पर लंबे समय में क्या असर पड़ेगा, और अब यह देखना बाकी है कि पुरानी गाड़ियां इस नए मिश्रण के साथ कितनी सहज हैं।

आगे क्या देखना होगा?

निवेशकों और आम उपभोक्ताओं को ऑटो इंडस्ट्री के इन नए फ्यूल स्टैंडर्ड्स के साथ तालमेल बिठाने पर नज़र रखनी होगी। यह देखना अहम होगा कि प्रमुख कार निर्माता कंपनियां माइलेज की कमी को दूर करने के लिए इंजन कैलिब्रेशन (engine calibration) में क्या सुधार लाती हैं, वैकल्पिक ईंधनों (alternative fuels) के लिए सरकारी नीतियों या कीमतों में कोई बदलाव होता है या नहीं, और E20 फ्यूल का नियमित इस्तेमाल करने वाली गाड़ियों के मेंटेनेंस पर क्या असर पड़ता है। जैसे-जैसे यह प्रोग्राम आगे बढ़ेगा, बाज़ार यह देखेगा कि क्या इन बदलावों का गाड़ियों की मांग पर कोई असर पड़ता है।

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