चेन्नई के रेस ट्यूनर अश्विन दुरई ने साफ किया है कि E20 पेट्रोल से गाड़ियों के इंजन को नुकसान पहुंचने की चिंताएं अक्सर बढ़ा-चढ़ाकर बताई जाती हैं। उन्होंने बताया कि आजकल की गाड़ियां, खासकर BS4 और उससे ऊपर के स्टैंडर्ड वाली, इथेनॉल वाले इस नए पेट्रोल को झेलने में सक्षम हैं।
E20 फ्यूल: क्या आपकी गाड़ी का इंजन है तैयार?
भारत में E20 फ्यूल (20% इथेनॉल वाला पेट्रोल) को लेकर काफी चर्चाएं हो रही हैं। कई लोग अपनी गाड़ियों के इंजन को लेकर चिंतित हैं। लेकिन चेन्नई की ICD Tuning के फाउंडर अश्विन दुरई का कहना है कि इंजन की सेहत को लेकर जो डर फैलाया जा रहा है, उसका ज्यादातर हिस्सा सोशल मीडिया की अफवाहों पर आधारित है, न कि इंजीनियरिंग के ठोस तथ्यों पर।
इंजन नॉकिंग और माइलेज पर क्या है असर?
दुरई के मुताबिक, इंजन नॉकिंग का डर गलत है। इथेनॉल का ऑक्टेन नंबर पेट्रोल से ज्यादा होता है, जो इंजन के कम्बशन प्रोसेस को स्थिर करने और नॉकिंग को कम करने में मदद कर सकता है। हां, इथेनॉल की एनर्जी वैल्यू थोड़ी कम होती है, जिससे माइलेज में मामूली कमी आ सकती है। लेकिन माइलेज में भारी गिरावट के दावे ऑटोमोटिव इंजीनियरिंग के सिद्धांतों से मेल नहीं खाते।
BS4 और उसके बाद की गाड़ियों में क्या है खास?
आजकल की जो गाड़ियां BS4 एमिशन स्टैंडर्ड या उससे ऊपर की हैं, उनमें एडवांस्ड इंजन कंट्रोल यूनिट (ECU) और ऑक्सीजन सेंसर लगे होते हैं। ये सिस्टम फ्यूल की मात्रा में होने वाले बदलावों के हिसाब से हवा और फ्यूल के मिक्सचर को अपने आप एडजस्ट कर लेते हैं। दुरई ने ब्राजील जैसे देशों का उदाहरण दिया, जहां सालों से इथेनॉल के हाई ब्लेंड्स का इस्तेमाल हो रहा है और वहां की गाड़ियों ने इसे सफलतापूर्वक अपनाया है।
मेंटेनेंस या फ्यूल क्वालिटी: असली वजह क्या?
दुरई ने एक अहम बात बताई कि फ्यूल से होने वाले नुकसान और खराब गाड़ी मेंटेनेंस के बीच अंतर समझना जरूरी है। आजकल के फ्यूल सिस्टम्स में ऐसे मटेरियल इस्तेमाल होते हैं जो इथेनॉल-रेसिस्टेंट होते हैं। उनके अनुसार, इंजेक्टर या रबर होज़ जैसे पार्ट्स के खराब होने की कई शिकायतें असल में पहले से मौजूद खराबी या रेगुलर सर्विसिंग न होने के कारण होती हैं, न कि सीधे फ्यूल ब्लेंड की वजह से।
लेकिन पुरानी गाड़ियों की बात थोड़ी अलग है। BS4 से पहले की जिन गाड़ियों में कार्बोरेटर लगे होते थे, उनके फ्यूल होज़ और सील इथेनॉल के संपर्क के लिए नहीं बने थे। ऐसे पुराने मॉडल के मालिकों को अपने फ्यूल सिस्टम की खास जांच कराने की सलाह दी जाती है।
निवेशकों और ग्राहकों के लिए क्या है मायने?
E20 की ओर यह कदम भारत की क्रूड ऑयल इंपोर्ट पर निर्भरता कम करने की रणनीति का अहम हिस्सा है। सरकार फॉरेन एक्सचेंज बचाने के लिए इथेनॉल ब्लेंडिंग को बढ़ावा दे रही है। इससे शुगर और डिस्टिलरी सेक्टर को फायदा हो रहा है, वहीं ऑटोमोटिव इंडस्ट्री ग्राहकों का भरोसा बनाए रखने के लिए गाड़ियों की ड्यूरेबिलिटी पर ध्यान दे रही है।
आगे चलकर, ऑटोमोटिव सेक्टर के लिए इंजन कंपोनेंट वियर पर लॉन्ग-टर्म असर और E20 कंपैटिबिलिटी को लेकर पब्लिक अवेयरनेस कैंपेन की सफलता पर नजर रखनी होगी। इन्वेस्टर्स के लिए, कंपनियों के मैन्युफैक्चरर गाइडलाइंस और आफ्टर-सेल्स सर्विस डेटा महत्वपूर्ण होंगे, जिनसे पता चलेगा कि इंडस्ट्री इस बदलाव से कितनी आसानी से निकल पाती है।
