भारतीय ऑटोमोबाइल बाज़ार में डीज़ल कारों की पूछ बढ़ गई है। फाइनेंशियल ईयर 2027 (FY27) में डीज़ल व्हीकल्स की हिस्सेदारी 19.39% हो गई है, जो पिछले साल FY26 में 18.08% थी। इस उछाल की वजह SUVs की धांसू डिमांड, पेट्रोल की बढ़ी कीमतें और E20 फ्यूल को लेकर खरीदारों की चिंताएं हैं।
डीज़ल का फिर से जलवा
भारतीय ऑटोमोबाइल बाज़ार में डीज़ल पावर्ड पैसेंजर व्हीकल्स की डिमांड में अप्रत्याशित उछाल देखा जा रहा है। एक समय जहां कंपनियां पेट्रोल और इलेक्ट्रिक पावरट्रेन की ओर बढ़ रही थीं, वहीं अब डीज़ल सेगमेंट ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। Vahan और FADA के आंकड़ों के मुताबिक, चालू फाइनेंशियल ईयर FY27 में डीज़ल व्हीकल्स ने कुल पैसेंजर कार बिक्री का 19.39% हिस्सा हासिल कर लिया है। यह पिछले फाइनेंशियल ईयर FY26 के 18.08% के मुकाबले एक अच्छी बढ़ोतरी है।
क्यों बढ़ रही है डीज़ल की डिमांड?
इस वापसी का सबसे बड़ा कारण SUVs का शानदार प्रदर्शन है। डीज़ल इंजन वाली कारों की मंथली रजिस्ट्री में करीब 15% का इजाफा हुआ है, जो लगभग 82,000 यूनिट्स तक पहुंच गई है। भारतीय खरीदारों, खासकर ₹15 लाख से ऊपर की SUVs खरीदने वालों के लिए, डीज़ल इंजन का टॉर्क (torque) और फ्यूल एफिशिएंसी (fuel efficiency) आज भी खास मायने रखती है। इसके अलावा, पेट्रोल की लगातार बढ़ती कीमतें भी कॉस्ट-कॉन्सस (cost-conscious) ग्राहकों को दूसरे विकल्पों की तलाश करने पर मजबूर कर रही हैं। वहीं, E20 इथेनॉल-ब्लेंडेड पेट्रोल में बदलते समय, कुछ खरीदार पुराने या नॉन-कम्पेटिबल पेट्रोल मॉडल्स के लॉन्ग-टर्म इंजन परफॉरमेंस को लेकर भी संशय में हैं।
ऑटो कंपनियों की रणनीति
ऑटोमोबाइल कंपनियां भी इस डिमांड को भुनाने में पीछे नहीं हैं। वे अपने नए मॉडल्स में डीज़ल ऑप्शन्स को बनाए रख रही हैं। हाल ही में लॉन्च हुए Mahindra XUV 3XO, Thar Roxx, Tata Safari, Hyundai Creta और Kia Seltos के अपडेटेड वर्ज़न में डीज़ल वेरिएंट्स उपलब्ध कराए गए हैं। Tata Motors ने भी अपने पोर्टफोलियो में बदलाव देखा है, जहाँ कंपनी इलेक्ट्रिक और CNG के विस्तार के बावजूद डीज़ल की डिमांड में मजबूती बता रही है। लग्जरी सेगमेंट की बात करें तो Mercedes-Benz India में डीज़ल कारों की डिमांड अब भी 40% के आसपास बनी हुई है। लग्जरी खरीदारों के लिए, टोटल कॉस्ट ऑफ ओनरशिप (Total Cost of Ownership) - जिसमें मेंटेनेंस और रीसेल वैल्यू के साथ फ्यूल का खर्चा भी शामिल है - एक अहम फैक्टर है।
रेगुलेटरी बदलावों पर नजर
हालांकि डीज़ल को फिलहाल बाज़ार में अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है, लेकिन निवेशकों को संभावित रेगुलेटरी बदलावों पर भी नज़र रखनी चाहिए। सरकार आयातित जीवाश्म ईंधनों (fossil fuels) पर निर्भरता कम करने के तरीके खोज रही है। रोड ट्रांसपोर्ट एंड हाईवेज मिनिस्टर नितिन गडकरी ने हाल ही में संकेत दिए हैं कि अथॉरिटीज डीज़ल में 15% तक आइसोब्यूटेनॉल (isobutanol) जैसे एडवांस्ड बायोफ्यूल को इंटीग्रेट करने पर विचार कर रही हैं। अगर यह लागू होता है, तो मौजूदा इंजन डिज़ाइन में बड़े बदलाव किए बिना एमिशन कम किए जा सकते हैं, जो डीज़ल इंजनों के लॉन्ग-टर्म भविष्य को प्रभावित कर सकता है।
शेयरधारकों के लिए सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि क्या आने वाले समय में कड़े एमिशन नॉर्म्स और क्लीन एनर्जी की ओर सरकार के push के बावजूद डीज़ल की यह रफ़्तार कायम रह पाएगी। निवेशकों को प्रमुख ऑटो मैन्युफैक्चरर्स की आने वाली तिमाही की वॉल्यूम रिपोर्ट्स पर नज़र रखनी चाहिए ताकि पता चल सके कि डीज़ल की ओर यह झुकाव उनके ऑपरेटिंग मार्जिन (operating margins) को बेहतर बनाने में मदद करता है या फिर पेट्रोल और इलेक्ट्रिक दोनों पाइपलाइन को बनाए रखने का खर्चा वित्तीय दबाव (financial pressure) पैदा करता है।
