सरकार के एक पैनल ने Delhi-NCR में नई पैसेंजर कारों के लिए 2030 तक 100% इलेक्ट्रिक व्हीकल बिक्री का प्रस्ताव रखा है। साल 2027 से शुरू होने वाले इस फेस्ड ट्रांजिशन के कारण ऑटो कंपनियों के बिजनेस मॉडल और स्ट्रैटेजी में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
क्या है सरकार का नया रोडमैप?
Commission for Air Quality Management (CAQM) द्वारा गठित पैनल ने दिल्ली-एनसीआर में पैसेंजर वाहनों के लिए एक सख्त नियम प्रस्तावित किया है। इस प्लान के तहत, साल 2027 तक नई कारों की बिक्री में 20% हिस्सा इलेक्ट्रिक होना अनिवार्य होगा। यह लक्ष्य 2028 में बढ़कर 45%, 2029 में 70% और अंत में 2030 तक 100% करने की योजना है।
यह नया प्रस्ताव दिल्ली EV पॉलिसी 2.0 से अलग है, जो मुख्य रूप से कमर्शियल वाहनों पर केंद्रित थी। अब निजी कारों को भी इस दायरे में लाने से ऑटो कंपनियों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
कंपनियों की चिंता और चुनौतियां
ऑटो सेक्टर के दिग्गजों ने इस आक्रामक टाइमलाइन पर सवाल उठाए हैं। इंडस्ट्री का तर्क है कि प्रदूषण में निजी कारों का योगदान केवल 3.4% है, इसलिए हाइब्रिड और CNG वाहनों को भी विकल्प के रूप में रखना चाहिए। कंपनियां अपनी मौजूदा प्रॉफिटेबल पोर्टफोलियो को बनाए रखने के साथ ही इलेक्ट्रिक सेगमेंट में निवेश करना चाहती हैं।
निवेशकों के लिए मुख्य चिंता मार्जिन को लेकर है। यदि कंपनियों को बाजार की मांग से पहले तेजी से उत्पादन बदलना पड़ा, तो मुनाफा कम हो सकता है। इसके अलावा, ₹5 लाख से कम कीमत वाली इलेक्ट्रिक कारें बनाना अभी भी बैटरी की ऊंची लागत के कारण एक बड़ी चुनौती है।
इंफ्रास्ट्रक्चर की भारी कमी
लक्ष्य को हासिल करने के लिए दिल्ली-एनसीआर में 36,000 से अधिक पब्लिक चार्जिंग स्टेशनों की जरूरत होगी। फिलहाल, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की भारी कमी एक बड़ा अड़ंगा है। हालांकि सरकार ₹30 लाख तक की EV पर रोड टैक्स और रजिस्ट्रेशन फीस में छूट दे रही है, लेकिन असल सफलता चार्जिंग नेटवर्क के विस्तार पर निर्भर करेगी।
अब निवेशकों की नजर इस बात पर है कि सरकार इसे फाइनल कैसे करती है और Maruti Suzuki, Tata Motors, और Mahindra & Mahindra जैसी बड़ी कंपनियां इस पर क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया देती हैं।
