पेट्रोल अभी भी है किंग, EV की रफ्तार तेज
दिल्ली के वाहन बाज़ार में इस फाइनेंशियल ईयर में इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) का रजिस्ट्रेशन 1.07 लाख यूनिट तक पहुंच गया, जो पिछले साल के मुकाबले 29% ज्यादा है। लेकिन, पेट्रोल और पेट्रोल-एथेनॉल पर चलने वाली गाड़ियाँ अभी भी मार्केट पर हावी हैं। इनकी कुल संख्या करीब 6.21 लाख यूनिट रही, जो कुल मार्केट शेयर का 73.1% है। पिछले साल के मुकाबले इनकी संख्या 5.30 लाख यूनिट से बढ़ी है, जो बताता है कि लोग अभी भी पारंपरिक ईंधन वाली गाड़ियों को ज्यादा पसंद कर रहे हैं, भले ही इलेक्ट्रिफिकेशन पर जोर दिया जा रहा हो। दिल्ली में कुल वाहन रजिस्ट्रेशन 17.9% बढ़कर 8.50 लाख यूनिट हो गया, जो पर्सनल ट्रांसपोर्ट की भारी मांग को दर्शाता है।
EV पॉलिसी का असर, लेकिन कीमत अभी भी बाधा
दिल्ली सरकार की EV पॉलिसी, जिसमें स्क्रैपेज इंसेंटिव्स और ₹30 लाख तक की EVs पर टैक्स ब्रेक शामिल हैं, EV अपनाने को बढ़ावा दे रही है। ये नीतियां EVs की शुरुआती ऊंची कीमतों को कम करने में मदद करती हैं, जो आमतौर पर पेट्रोल कारों से 20-30% महंगी होती हैं। हालांकि, लंबी अवधि में EVs चलाने का खर्च (₹1-1.5 प्रति किमी) पेट्रोल कारों (₹6.5-10 प्रति किमी) से काफी कम है, लेकिन उनकी शुरुआती ज्यादा कीमत और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी, पेट्रोल वाहनों को अभी भी कई खरीदारों के लिए एक प्रैक्टिकल विकल्प बनाती है।
हाइब्रिड और CNG में भी तेजी: बदलते ईंधन ट्रेंड
पारंपरिक ईंधनों में, डीज़ल रजिस्ट्रेशन 11,498 यूनिट पर आ गया, जो 2019 के बाद सबसे कम स्तर के करीब है। वहीं, CNG वाहनों की बिक्री 25,330 से बढ़कर 32,224 यूनिट हो गई, जो क्लीनर फॉसिल फ्यूल के प्रति झुकाव दिखाता है। हाइब्रिड सेगमेंट में सबसे बड़ी उछाल देखी गई, इनकी बिक्री दोगुनी से ज्यादा बढ़कर 32,902 यूनिट हो गई। हाइब्रिड गाड़ियाँ रेंज की चिंता के बिना बेहतर फ्यूल एफिशिएंसी और कम उत्सर्जन का वादा करती हैं, जो उन खरीदारों को आकर्षित कर रही हैं जो टेक्नोलॉजी और पर्यावरण-मित्रता का मिश्रण चाहते हैं। देश भर में, शुरुआती 2026 तक पैसेंजर वाहनों की बिक्री में EVs की हिस्सेदारी लगभग 6% थी, जबकि पेट्रोल की हिस्सेदारी 70% से अधिक थी। दिल्ली में कुल रजिस्ट्रेशन में EV का पेनिट्रेशन 12.7% था, जो राष्ट्रीय औसत से अधिक है।
इंफ्रास्ट्रक्चर और लागत: EV अपनाने की राह में बड़े रोड़े
सरकारी प्रयासों और EVs के दीर्घकालिक लागत लाभों के बावजूद, पारंपरिक वाहनों से इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर शिफ्ट धीमा है। EVs की 20-30% ज्यादा शुरुआती कीमत भारतीय खरीदारों के लिए एक बड़ी रुकावट बनी हुई है। चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर भी अभी हर जगह मौजूद नहीं है, खासकर शहरों के बाहर, जिससे रेंज को लेकर चिंता बनी रहती है। उपभोक्ता आज की व्यावहारिकता और आसान रीफ्यूलिंग को भविष्य के पर्यावरणीय लाभों से ऊपर रख रहे हैं। डीज़ल की बिक्री कम हो रही है, लेकिन परफॉरमेंस के कारण यह अभी भी कुछ खास सेगमेंट्स (जैसे SUVs) में अपनी जगह बनाए हुए है।
इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की ओर धीमी, पर निश्चित बदलाव की उम्मीद
पॉलिसी सपोर्ट और अधिक मॉडलों की उपलब्धता के साथ EV को अपनाना तेजी से बढ़ने की उम्मीद है। हालांकि, पारंपरिक ईंधनों से पूरी तरह दूर जाने में अभी कई साल लगेंगे। हाइब्रिड टेक्नोलॉजी को उपभोक्ताओं के लिए एक पुल के रूप में देखा जा रहा है। EVs की मार्केट हिस्सेदारी बढ़ेगी, लेकिन पेट्रोल वाहन दिल्ली और भारत के ऑटो सेक्टर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा लंबे समय तक बने रहेंगे। भविष्य की EV नीतियों को इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार और EVs को और अधिक किफायती बनाने पर ध्यान देना होगा।