दिल्ली का EV प्लान खतरे में? CNG पर दांव, इंफ्रास्ट्रक्चर पर बड़ा सवाल!

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
दिल्ली का EV प्लान खतरे में? CNG पर दांव, इंफ्रास्ट्रक्चर पर बड़ा सवाल!
Overview

दिल्ली-एनसीआर (Delhi-NCR) को **2030** तक पूरी तरह इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) वाला शहर बनाने की सरकारी योजना पर इंडस्ट्री ने बड़ा सवाल उठाया है। शहर गैस वितरकों और कार निर्माताओं का कहना है कि चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर (Charging Infrastructure) की कमी, ग्रिड की क्षमता और ग्राहकों के लिए फाइनेंसिंग जैसी दिक्कतें इस लक्ष्य को मुश्किल बना रही हैं।

EV मैंडेट पर इंडस्ट्री का कड़ा विरोध

वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) की विशेषज्ञ समिति ने दिल्ली-एनसीआर में 2030 तक सिर्फ इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) के रजिस्ट्रेशन की सिफारिश की है। इसका मकसद ट्रांसपोर्ट से होने वाले प्रदूषण को कम करना है, जो क्षेत्र में PM 2.5 का 23% हिस्सा है। हालांकि, शहर गैस वितरक (City Gas Distributors) और कार निर्माता कंपनियां इस प्रस्ताव का पुरजोर विरोध कर रही हैं। उनकी चिंता है कि इस बदलाव के लिए भारी इंफ्रास्ट्रक्चर लागत आएगी और समय-सीमा भी अव्यावहारिक है।

इस क्षेत्र में प्रमुख गैस वितरक, इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड (IGL) ने 'ड्यूल पाथवे' (Dual Pathway) रणनीति का सुझाव दिया है। इसके तहत, मध्यम और भारी वाहनों के लिए कंप्रेस्ड नेचुरल गैस (CNG) का इस्तेमाल जारी रखने और दोपहिया वाहनों के लिए इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को बढ़ावा देने की बात कही गई है। IGL का यह भी कहना है कि डीजल वाहनों को CNG में बदलकर धीरे-धीरे बंद किया जा सकता है, क्योंकि CNG से निकलने वाले पार्टिकुलेट मैटर (Particulate Matter) काफी कम होते हैं। वहीं, एसोसिएशन ऑफ सिटीगैस डिस्ट्रीब्यूशन एंटिटीज (ACE) भी CAQM से CNG को एक अलग, कम उत्सर्जन वाला ईंधन मानने और CNG व EV दोनों को समान प्रोत्साहन देने की अपील कर रहा है। कार निर्माता भी तेजी से EV अपनाने को लेकर चिंतित हैं, क्योंकि दिल्ली में चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, पावर ग्रिड क्षमता और ग्राहक फाइनेंसिंग की व्यवस्था अभी चार साल के भीतर सभी EV के लिए पर्याप्त नहीं है।

CNG की पकड़ क्यों मजबूत? EV से मुकाबला

इलेक्ट्रिफिकेशन (Electrification) की जोर-शोर से तैयारी के बावजूद, CNG का दबदबा अभी भी कायम है। IGL का मार्केट कैपिटलाइजेशन (Market Capitalisation) करीब ₹24,000 करोड़ है, जबकि इसका P/E रेश्यो (P/E Ratio) 14-17 के बीच है। इसके मुकाबले, गुजरात गैस लिमिटेड (GGL) का मार्केट कैप करीब ₹28,000 करोड़ है, लेकिन P/E रेश्यो 24-25 है। महानगर गैस लिमिटेड (MGL) का मार्केट कैप लगभग ₹11,900 करोड़ है और P/E रेश्यो 11-12 है। ऐतिहासिक रूप से, दिल्ली के वायु प्रदूषण को कम करने में CNG का बड़ा योगदान रहा है। CNG वाहनों के व्यापक रूप से अपनाए जाने से पहले के मुकाबले PM स्तर में लगभग 30% की कमी आई थी।

हालांकि, FAME, PLI और PM E-DRIVE जैसी राष्ट्रीय नीतियां EV और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा दे रही हैं, लेकिन CNG इंफ्रास्ट्रक्चर को भी 2030 तक 10,000 स्टेशनों तक पहुंचाने का लक्ष्य है। एक रिपोर्ट के अनुसार, 2020-2030 के दशक में CNG का दबदबा रहने का अनुमान था, और EV 2030 के करीब रफ्तार पकड़ेंगे। EVs की रनिंग कॉस्ट (Running Cost) कम होती है, लेकिन इनकी शुरुआती कीमत (Upfront Capital Expense) पेट्रोल/डीजल वाहनों से ₹5-10 लाख ज्यादा है, जबकि CNG किट लगवाने का खर्च सिर्फ ₹0.5-0.9 लाख आता है। इसलिए, यह कीमत के प्रति संवेदनशील ग्राहकों के लिए CNG को ज्यादा किफ़ायती बनाता है। IGL खुद भी टिकाऊ लॉजिस्टिक्स के लिए LNG/LCNG इंफ्रास्ट्रक्चर स्थापित करने के लिए CONCOR के साथ एक समझौता (MoU) कर रही है।

इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और रिस्क

दिल्ली-एनसीआर में पूरी तरह EV पर शिफ्ट होने की राह में सबसे बड़ी बाधा चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की भारी कमी है। दिल्ली को लगभग 36,177 चार्जिंग पॉइंट्स की ज़रूरत है, जबकि अभी केवल 8,998 ही चालू हैं, यानी 27,000 से अधिक की कमी है। देशव्यापी स्तर पर, 2030 तक 13 लाख से अधिक चार्जिंग स्टेशनों की ज़रूरत पड़ सकती है, जिसके लिए सालाना 3 लाख से 4 लाख चार्जर लगाने होंगे, जो मौजूदा गति से कहीं ज्यादा है।

इसके अलावा, IGL का बिजनेस मॉडल काफी हद तक CNG पर निर्भर है, जो FY24 में उसके 75% बिक्री वॉल्यूम का हिस्सा था। EVs का बढ़ना CNG वाहनों के लिए मध्यम से लंबी अवधि में एक खतरा पैदा कर सकता है, जो IGL के राजस्व को प्रभावित कर सकता है। यह चिंता भी है कि CNG जैसे जीवाश्म ईंधन में लगातार निवेश करने से शहरों को अगले एक दशक तक कम्बशन टेक्नोलॉजी (Combustion Technology) में फंसाए रखने का जोखिम है, जिससे जीरो-टेलपाइप-एमिशन (Zero-tailpipe-emission) समाधानों में देरी हो सकती है। अतीत में ऑड-ईवन (Odd-Even) जैसे नियमों ने भी प्रदूषण के स्तर पर बहुत कम प्रभाव दिखाया है, जिससे ऐसे उपायों की प्रभावशीलता पर सवाल उठता है।

भविष्य का नज़रिया

विश्लेषकों का मानना है कि CNG और EV सह-अस्तित्व में रह सकते हैं, हालांकि आक्रामक सरकारी EV नीतियां CNG की वृद्धि पर कुछ दबाव डाल सकती हैं। नोमुरा (Nomura) की रिपोर्ट बताती है कि जबकि दिल्ली की नीतियां CNG को निशाना बना सकती हैं, मुंबई में अधिक संतुलित बदलाव देखने को मिल सकता है। IGL प्रबंधन का भरोसा है कि आने वाली नीतियां CNG के पक्ष में भी हो सकती हैं। अनुमान है कि 2030 के करीब तक EV कार और बस सेगमेंट में हावी हो सकते हैं, लेकिन शुरुआती लागत और परिचालन व्यय (Operational Expenses) में CNG के आर्थिक फायदे यह सुनिश्चित करते हैं कि निकट भविष्य में, खासकर कीमत के प्रति संवेदनशील ग्राहकों और वाणिज्यिक बेड़े (Commercial Fleets) के लिए, यह प्रासंगिक बना रहेगा।

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