नई कार या बाइक खरीदने वाले ग्राहकों को अब डीलरशिप पर इंश्योरेंस (Insurance) के लिए परेशान नहीं किया जाएगा। कई डीलरशिप अब ग्राहकों से यह कहकर गाड़ी की डिलीवरी रोकने की कोशिश कर रही हैं कि उन्हें शोरूम से ही इंश्योरेंस खरीदना होगा, जो कि IRDAI के नियमों का खुला उल्लंघन है।
डीलरशिप पर क्यों कसेगा शिकंजा?
भारत में कार खरीदार इन दिनों एक नई परेशानी का सामना कर रहे हैं। उन्हें नई गाड़ी या बाइक की डिलीवरी लेने के लिए शोरूम से ही इंश्योरेंस (Insurance) खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है। लीगल एक्सपर्ट्स और रेगुलेटर्स (Regulators) का कहना है कि यह सीधे तौर पर इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (IRDAI) के नियमों के खिलाफ है। IRDAI के नियमों के अनुसार, ग्राहक अपनी मर्जी से किसी भी इंश्योरेंस कंपनी को चुन सकता है, बस शर्त यह है कि गाड़ी पर वैलिड इंश्योरेंस (Valid Insurance) होना चाहिए।
मार्जिन कम, कमीशन ज्यादा: डीलर की मजबूरी?
कार डीलरशिप के इस रवैये के पीछे ऑटोमोटिव रिटेल सेक्टर (Automotive Retail Sector) की बदलती आर्थिक स्थिति है। गाड़ियों पर मार्जिन (Margins) कम होने और कॉम्पिटिशन (Competition) बढ़ने के कारण डीलरशिप पर मुनाफा बनाए रखने का भारी दबाव है। ऐसे में, इंश्योरेंस से मिलने वाला कमीशन (Commission) उनके लिए कमाई का एक बड़ा जरिया बन गया है। डीलर ग्राहकों को शोरूम की महंगी पॉलिसी खरीदने के लिए मजबूर करके हर गाड़ी की बिक्री पर अपना मुनाफा बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला और बढ़ा दबाव
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के एक फैसले ने इस मामले को और गंभीर बना दिया है। कोर्ट ने कहा है कि अब नई प्राइवेट कारों के लिए चार साल और नई टू-व्हीलर्स के लिए छह साल का थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस (Third-Party Insurance) लेना अनिवार्य होगा। इससे इंश्योरेंस प्रीमियम (Insurance Premium) की कुल रकम काफी बढ़ गई है। ज्यादा प्रीमियम मतलब ज्यादा कमीशन, जिससे डीलरशिप पर ग्राहकों को अपनी पसंदीदा इंश्योरेंस कंपनी चुनने के बजाय शोरूम के जरिए पॉलिसी खरीदने का दबाव बनाने का लालच और बढ़ गया है।
फायदे में इंश्योरेंस कंपनियां, खतरे में डीलरशिप
एक तरफ जहां इंश्योरेंस कंपनियां (Insurance Companies) बढ़े हुए प्रीमियम और सरकारी नियमों के अनुपालन से फायदे में हैं, वहीं दूसरी तरफ डीलरशिप एक मुश्किल दौर से गुजर रही हैं। 'नो इंश्योरेंस, नो फ्यूल' (No Insurance, No Fuel) जैसा पायलट प्रोजेक्ट भी सरकार के इंश्योरेंस पर फोकस को दिखाता है। हालांकि, डीलरशिप के लिए यह जबरन इंश्योरेंस बिक्री से होने वाला तात्कालिक फायदा लंबे समय में भारी पड़ सकता है। गलत व्यापार प्रथाओं (Unfair Trade Practices) के कारण रेगुलेटरी जांच, कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट (Consumer Protection Act) के तहत जुर्माना और ब्रांड की इमेज को नुकसान पहुंचने का खतरा है।
निवेशकों के लिए संकेत
निवेशकों (Investors) के लिए यह स्थिति ऑटोमोटिव डीलरशिप की फाइनेंशियल हेल्थ (Financial Health) पर नजर रखने का एक अहम संकेत है। आक्रामक तरीके अक्सर कैश फ्लो (Cash Flow) की समस्या या कमजोर ऑपरेशनल परफॉर्मेंस की ओर इशारा करते हैं। जहां ICICI Lombard, New India Assurance और Go Digit जैसी इंश्योरेंस कंपनियां सरकारी नियमों के कारण वॉल्यूम ग्रोथ (Volume Growth) देख सकती हैं, वहीं बीच का जरिया, यानी डीलरशिप, दबाव में है। निवेशकों को अब यह देखना होगा कि ऑटोमोबाइल निर्माता अपनी डीलर नेटवर्क को कैसे मैनेज करते हैं, रेगुलेटरी बॉडीज (Regulatory Bodies) कितनी सख्ती बरतती हैं, और क्या ग्राहकों की बढ़ती जागरूकता के कारण यह जबरन इंश्योरेंस बिक्री कम होती है, जिससे डीलरशिप को टिकाऊ रेवेन्यू मॉडल (Revenue Model) खोजने पड़ें।
