बजट के ₹12.2 लाख करोड़ से टायर इंडस्ट्री को संजीवनी
वित्त वर्ष 2026-27 के लिए पब्लिक कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) के तौर पर ₹12.2 लाख करोड़ का ऐलान, भारतीय टायर इंडस्ट्री के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। ऑटोमोटिव टायर मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ATMA) का मानना है कि सड़कों, रेलवे और लॉजिस्टिक्स (Logistics) जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में इस बड़ी सरकारी खर्च से गाड़ियों का इस्तेमाल बढ़ेगा और बेड़े (Fleet) का विस्तार होगा, जो सीधे तौर पर टायरों की मांग को पंख लगाएगा।
ATMA के चेयरमैन अरुण मम्मेन ने कहा है कि टायर इंडस्ट्री का विकास इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार से सीधा जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा, 'यह ऊंचाई पर चल रहा पब्लिक कैपिटल एक्सपेंडिचर, पैसेंजर और कमर्शियल दोनों सेगमेंट में टायरों की मांग को रफ्तार देगा।' उन्होंने यह भी उम्मीद जताई कि टियर-2 और टियर-3 शहरों में ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर देने से नए बाजारों के दरवाजे खुलेंगे और रिप्लेसमेंट (Replacement) व ओरिजिनल इक्विपमेंट (OE) दोनों के लिए मांग में इजाफा होगा।
ग्लोबल मंच पर भारतीय टायर कंपनियां
भारतीय टायर कंपनियों का जलवा ग्लोबल मार्केट में भी बढ़ रहा है। दुनिया की टॉप 20 टायर कंपनियों की लिस्ट में 4 भारतीय कंपनियाँ शामिल हैं। MRF लिमिटेड 13वें, Apollo Tyres 14वें, JK Tyre & Industries 19वें और CEAT ने पहली बार टॉप 20 में 20वें स्थान पर अपनी जगह बनाई है। यह भारत की टायर मैन्युफैक्चरिंग क्षमता की बढ़ती ताकत को दिखाता है।
MRF का मार्केट कैप करीब ₹56,000 करोड़ है और वित्त वर्ष 2025 तक इसका एक्सपोर्ट टर्नओवर ₹2,307 करोड़ तक पहुंच गया था। Apollo Tyres का मार्केट कैप करीब ₹31,000 करोड़ है और इसका यूरोप में भी मजबूत दखल है। CEAT, जिसका मार्केट कैप करीब ₹15,000 करोड़ है, ने हाल ही में Q3 FY26 में अपने नेट प्रॉफिट में 60% की शानदार ईयर-ऑन-ईयर ग्रोथ दर्ज की है। JK Tyre, जिसका मार्केट कैप भी लगभग ₹15,000 करोड़ है, रेडियल टेक्नोलॉजी में अग्रणी मानी जाती है।
'इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर' का दर्द
एक तरफ जहां बजट से मांग बढ़ने की उम्मीद है, वहीं टायर इंडस्ट्री एक पुरानी समस्या से जूझ रही है - 'इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर'। इस समस्या में टायर बनाने के लिए जरूरी कच्चे माल (जैसे नेचुरल रबर) पर इंपोर्ट ड्यूटी, तैयार इंपोर्टेड टायरों पर लगने वाली ड्यूटी से ज़्यादा होती है। इसकी वजह से भारतीय मैन्युफैक्चरर्स सस्ते इंपोर्टेड टायरों के मुकाबले कॉम्पिटिटिव (Competitive) नहीं रह पाते।
अरुण मम्मेन ने 'मेक इन इंडिया' (Make in India) पहल के हित में इस मुद्दे को हल करने की गुहार लगाई है। हालांकि बजट में सीधे तौर पर इसका समाधान नहीं निकला, पर GST (Goods and Services Tax) में हुए कुछ बदलावों से थोड़ी राहत मिल सकती है। अब इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर का सामना कर रहे टैक्सपेयर्स (Taxpayers) को 90% तक का प्रोविजनल रिफंड (Provisional Refund) मिल सकता है, जिससे वर्किंग कैपिटल (Working Capital) की समस्या कुछ हद तक कम हो सकती है।
भविष्य की राह
बजट सिर्फ पारंपरिक इंफ्रास्ट्रक्चर तक सीमित नहीं है, बल्कि क्लीन मोबिलिटी (Clean Mobility) और ईवी (EV) इकोसिस्टम पर भी जोर दिया गया है। इससे स्पेशलाइज्ड ईवी टायरों की मांग बढ़ेगी। साथ ही, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने वाली पहलों से फार्म और टू-व्हीलर टायरों की मांग भी बढ़ने का अनुमान है। कुल मिलाकर, अगर 'इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर' जैसी समस्याओं का समाधान होता रहा, तो भारतीय टायर सेक्टर आने वाले सालों में शानदार ग्रोथ दिखा सकता है।