EV मार्केट में दिखेगी दिग्गजों की नहीं, कई कंपनियों की धूम: Bernstein

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AuthorAditya Rao|Published at:
EV मार्केट में दिखेगी दिग्गजों की नहीं, कई कंपनियों की धूम: Bernstein

Bernstein के एनालिस्ट्स का मानना है कि भारत का इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर मार्केट, पेट्रोल वाले वाहनों की तरह एक जगह सिमट कर नहीं रहेगा। इलेक्ट्रिक मॉडल्स के लिए मैन्युफैक्चरिंग के कम बैरियर्स के चलते, आम सेगमेंट में कुछ बड़ी कंपनियों का दबदबा बनने की उम्मीद कम है। यह आउटलुक एक बड़े बदलाव की ओर इशारा करता है, जहाँ केवल प्रीमियम सेगमेंट में ही ब्रांड-आधारित एकाधिकार देखने को मिल सकता है।

Detailed Coverage

क्यों नहीं सिमटेगा मास-मार्केट?

पेट्रोल-संचालित दोपहिया वाहनों के मार्केट में बड़ी कंपनियों का दबदबा उनकी विशाल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता, मजबूत सर्विस नेटवर्क और पुराने ब्रांड भरोसे के कारण है। लेकिन, इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) सेक्टर में एंट्री के बैरियर्स काफी कम हैं। नए मॉडल्स को डेवलप करना तेज है, और बाहर से मोटर व बैटरी कंपोनेंट्स मिलने की वजह से छोटी कंपनियाँ भी बड़े निर्माताओं जैसी भारी-भरकम इंफ्रास्ट्रक्चर के बिना प्रतिस्पर्धी उत्पाद ला सकती हैं। यही वजह है कि आम सेगमेंट में कुछ ही कंपनियों का कब्ज़ा होने के बजाय, यह मार्केट कई प्लेयर्स के बीच बंटा रहने की संभावना है।

प्रीमियम सेगमेंट में दिग्गजों के लिए रिस्क?

आम मार्केट भले ही कई प्लेयर्स के लिए खुला रहे, लेकिन प्रीमियम EV सेगमेंट में स्थापित कंपनियों के लिए अलग चुनौतियाँ हैं। Bernstein के अनुसार, यह सेगमेंट अभी अपनी शुरुआती दौर में है और पूरी तरह से परिभाषित नहीं है। यहाँ कुछ खास ब्रांड्स अपनी पकड़ बना सकते हैं, ठीक वैसे ही जैसे Royal Enfield ने प्रीमियम पेट्रोल-बाइक कैटेगरी में अपनी जगह बनाई थी।

लेकिन, इस सेगमेंट में स्थापित कंपनियों के लिए रणनीतिक जोखिम भी हैं। अगर कोई नया प्लेयर बैटरी सेल प्रोडक्शन में बड़ा कॉस्ट एडवांटेज हासिल कर लेता है, या कोई मैन्युफैक्चरर अपने खास सॉफ्टवेयर और चार्जिंग इकोसिस्टम से ग्राहकों को बांधने में सफल हो जाता है, तो प्रतिस्पर्धी परिदृश्य बदल सकता है। इसके अलावा, थर्ड-पार्टी बैटरी-स्वैपिंग नेटवर्क का बढ़ना वाहनों को ही कमोडिटी बना सकता है, जिससे पावर वाहन निर्माताओं से छिनकर कंपोनेंट सप्लायर्स या टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म्स की ओर जा सकती है।

निवेशकों के लिए मुख्य बात यह है कि भारतीय दोपहिया उद्योग का पारंपरिक 'विजेता सब ले जाता है' वाला मॉडल EV पर लागू नहीं हो सकता है। जैसे-जैसे मार्केट विकसित होगा, निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनियाँ अपने सॉफ्टवेयर इकोसिस्टम, चार्जिंग की सुविधा और बैटरी से जुड़े खर्चों को कैसे मैनेज करती हैं। यही फैक्टर्स तय करेंगे कि कौन से निर्माता इस ज़्यादा भीड़भाड़ वाले और बिखरे हुए मार्केट में प्रॉफिटेबिलिटी और प्राइसिंग पावर बनाए रख पाएँगे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.