PM E-DRIVE स्कीम के तहत मिल रही सरकारी मदद 31 मार्च 2028 को खत्म हो जाएगी। ऐसे में Bajaj Auto और Tata Motors ने अपनी रणनीति बदल ली है और सब्सिडी पर निर्भरता कम करने के लिए प्रोडक्शन और लागत में बदलाव कर रहे हैं।
भारत के इलेक्ट्रिक व्हीकल सेक्टर में एक बड़े बदलाव की आहट सुनाई दे रही है। सरकार की PM E-DRIVE स्कीम की मियाद 31 मार्च 2028 को खत्म हो रही है। इस डेडलाइन को देखते हुए ऑटो सेक्टर की दिग्गज कंपनियां Bajaj Auto और Tata Motors ने खुद को आत्मनिर्भर बनाने की रेस तेज कर दी है।
कैसे मुनाफा बनाए रखेंगी कंपनियां?
Bajaj Auto अपने इंजीनियरिंग कौशल पर पूरा जोर दे रही है। कंपनी अपने प्लेटफॉर्म्स को फिर से डिजाइन कर रही है ताकि गाड़ियों की लागत कम हो सके और वे सरकारी सब्सिडी के बिना भी प्रॉफिटेबल बनी रहें। Chetak स्कूटर और इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर्स की सफलता के बाद Bajaj का ईवी डिवीजन अब कंपनी की ओवरऑल फाइनेंशियल हेल्थ में अच्छी भागीदारी निभा रहा है।
वहीं, Tata Motors का फोकस 'स्केल' पर है। कंपनी कमर्शियल सेक्टर में अपनी मौजूदगी बढ़ा रही है और इलेक्ट्रिक ट्रकों के साथ बड़े लॉजिस्टिक्स पार्टनर्स को जोड़ रही है। उनका लक्ष्य प्रोडक्शन वॉल्यूम बढ़ाकर प्रति वाहन लागत (cost per unit) को कम करना है ताकि भविष्य में बाहरी वित्तीय मदद की जरूरत न पड़े।
क्या हैं चुनौतियां और रिस्क?
इन्वेस्टर्स के लिए सबसे बड़ी चिंता सब्सिडी हटने के बाद कंज्यूमर डिमांड को लेकर है। अगर कंपनियों को सपोर्ट खत्म होने के बाद कीमतें बढ़ानी पड़ीं, तो सेल्स में गिरावट आ सकती है। दुनिया के अन्य देशों (जैसे चीन और अमेरिका) में भी सब्सिडी हटने के शुरुआती दौर में यही ट्रेंड देखा गया था।
फिलहाल, दोनों कंपनियों के सामने डिमांड तो ज्यादा है, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी की सीमाएं एक बड़ी चुनौती हैं। अब 'डीप लोकलाइजेशन' यानी पुर्जों को भारत में ही बनाने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि गाड़ियों की कीमत ग्राहकों के लिए किफायती बनी रहे। 2028 तक यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ये कंपनियां पूरी तरह से आत्मनिर्भर मॉडल पर शिफ्ट हो पाती हैं।
