बजाज फाइनेंस के शेयरों में आज यानी शुक्रवार को **8.11%** की जोरदार तेजी देखने को मिली। कंपनी के दमदार तिमाही नतीजों ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया, जिससे निफ्टी50 भी **0.27%** चढ़कर **24,383.60** पर बंद हुआ।
तिमाही नतीजों का कमाल: 8% भागा Bajaj Finance
भारतीय शेयर बाज़ार ने जुलाई को सकारात्मक नोट पर खत्म किया, लगातार दूसरे महीने मजबूती दर्ज की। शुक्रवार को NSE Nifty50 66.45 अंक बढ़कर 24,383.60 पर बंद हुआ, जबकि BSE Sensex 166.49 अंक चढ़कर 78,094.64 पर पहुंच गया। इस तेजी में फाइनेंशियल और ऑटो सेक्टर का बड़ा योगदान रहा, जिन्होंने IT सेक्टर की नरमी को मात दी।
Bajaj Finance के शेयरों ने सबसे ज्यादा चमक बिखेरी, कंपनी के नतीजों के बाद 8.11% की छलांग लगाई। नतीजों के प्रति बाजार की सकारात्मक प्रतिक्रिया ने इसके पैरेंट ग्रुप Bajaj Finserv के शेयरों को भी 6.60% तक ऊपर पहुंचाया। ऑटो सेक्टर भी पीछे नहीं रहा, Mahindra & Mahindra के शेयर 3.58% चढ़े, जिससे Nifty Auto इंडेक्स 1.64% मजबूत हुआ।
IT सेक्टर में मुनाफावसूली, लेकिन लंबी अवधि का भरोसा कायम
जहां एक तरफ फाइनेंशियल और ऑटो सेक्टर ने बाजार को संभाला, वहीं IT शेयरों में बिकवाली का दबाव दिखा। Tata Consultancy Services (TCS) के शेयर 2.73%, Infosys 2.26% और Wipro 2.72% तक गिरे। हालांकि, यह ध्यान देने योग्य है कि IT सेक्टर जुलाई महीने में 16.8% की शानदार बढ़त के साथ टॉप परफॉर्मर रहा था, जो पिछले छह सालों में इसका सबसे अच्छा मासिक प्रदर्शन था। यह गिरावट शायद हालिया तेजी के बाद एक मामूली मुनाफावसूली हो सकती है, न कि लंबी अवधि के सेंटिमेंट में बदलाव।
बाजार का मिजाज और मैक्रो इकोनॉमिक्स
बाजार में घबराहट कम हुई, जिसका असर इंडिया VIX (वोलेटिलिटी इंडेक्स) में 3.29% की गिरावट और 11.76 पर बंद होने से दिखा। निवेशकों को वीकेंड पर अधिक सहज महसूस हुआ। इसके अतिरिक्त, भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 0.3% मजबूत होकर 95.38 पर बंद हुआ, जो मार्च के बाद इसकी सबसे मजबूत साप्ताहिक क्लोजिंग रही।
हालांकि, मैक्रो इकोनॉमिक माहौल जटिल बना हुआ है। शुक्रवार को रुपया मजबूत हुआ, लेकिन जुलाई महीने में यह 0.7% कमजोर हुआ। इस दबाव का मुख्य कारण कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें हैं, ब्रेंट क्रूड $88.16 प्रति बैरल के करीब कारोबार कर रहा है। तेल की ऊंची कीमतें भारत के आयात बिल को बढ़ा सकती हैं और अक्सर मुद्रा पर दबाव डालती हैं, साथ ही कंपनियों के मुनाफे के मार्जिन को भी प्रभावित करती हैं, खासकर अगर वे बढ़ी हुई लागत उपभोक्ताओं पर नहीं डाल पाती हैं। निवेशक आने वाले हफ्तों में इन ऊर्जा लागतों के रुझान पर बारीकी से नजर रखेंगे और यह भी देखेंगे कि क्या वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच फाइनेंशियल और ऑटो सेक्टर की मजबूत लय जारी रह पाती है।
