BMW की मोबाइल ऐप के गलत इस्तेमाल का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसमें एक कार को ट्रैक किया गया। यह घटना 'कनेक्टेड कार' इकोसिस्टम में सुरक्षा की गंभीर खामियों की ओर इशारा करती है, जो ग्लोबल ऑटो कंपनियों के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है।
स्मार्टफोन से जुड़ी कार फीचर्स आजकल ऑटो कंपनियों के लिए बिक्री बढ़ाने का सबसे बड़ा जरिया बन गए हैं। लेकिन, हाल ही में एक BMW कार के साथ हुई घटना ने इस डिजिटल बदलाव के पीछे छिपे सुरक्षा खतरों को उजागर कर दिया है। एक यूजर ने रिपोर्ट किया कि उनके पूर्व साथी ने कंपनी की मोबाइल एप्लिकेशन का इस्तेमाल करके उनकी लोकेशन ट्रैक की और कार के फीचर्स को रिमोटली कंट्रोल किया। यह मामला इस बात का प्रमाण है कि ऑटो कंपनियां सेकेंडरी एक्सेस को मैनेज और उसे हटाने के मामले में कितनी बड़ी चूक कर रही हैं।
डिजिटल एक्सेस मैनेजमेंट की चुनौती
आजकल कंपनियां 'Software-Defined Vehicle' (SDV) के दौर में रिमोट लॉकिंग, क्लाइमेट कंट्रोल और ट्रैकिंग जैसे फीचर्स को स्टैंडर्ड बना रही हैं। समस्या तब आती है जब कार का मालिकाना हक बदलता है या गाड़ी शेयर की जाती है। इस मामले में भी डीलरशिप के प्रोटोकॉल इतने जटिल थे कि यूजर को अनधिकृत एक्सेस हटाने में भारी मशक्कत करनी पड़ी। यह न केवल कस्टमर सर्विस की विफलता है, बल्कि कंपनियों के लिए बड़ी कानूनी जिम्मेदारी (Liability) भी बन सकती है।
इंडस्ट्री के लिए बढ़ते रिस्क
यह समस्या सिर्फ BMW तक सीमित नहीं है। Tesla से लेकर Mercedes-Benz तक, हर बड़ी ऑटो कंपनी इस जंग से जूझ रही है। निवेशकों के लिए यह एक लंबा रिस्क है क्योंकि भारत के Digital Personal Data Protection (DPDP) Act जैसे सख्त कानूनों के आने के बाद, कंपनियों पर डेटा की सुरक्षा के लिए भारी दबाव बढ़ेगा। नियमों का पालन न करने पर कंपनियों को रेपुटेशन के नुकसान और भारी कानूनी जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है।
भारतीय बाजार और भविष्य
भारत में भी Tata Motors और Mahindra & Mahindra जैसे दिग्गज अपनी गाड़ियों में रियल-टाइम ट्रैकिंग जैसे फीचर्स बढ़ा रहे हैं। हालांकि, ये फीचर्स ग्राहकों को सुविधा देते हैं, लेकिन साथ ही साइबर हमलों का खतरा भी बढ़ाते हैं। आने वाले समय में, जो कंपनियां साइबर सुरक्षा और डिजिटल-फर्स्ट सुरक्षा प्रोटोकॉल पर ज्यादा निवेश करेंगी, वही बाजार में लंबी रेस की घोड़ी साबित होंगी।
