त्योहारी सीजन में गाड़ियों की बिक्री बढ़ाने के लिए ऑटो कंपनियां अब भारी डिस्काउंट के बजाय मॉडल-आधारित ऑफर्स पर जोर दे रही हैं। सितंबर में रिकॉर्ड होलसेल बिक्री के बावजूद, निवेशक अब इन्वेंट्री के बोझ और मुनाफे पर पड़ने वाले असर को लेकर सतर्क हैं।
त्योहारी सीजन के बीच भारतीय ऑटो कंपनियां अपनी सेल्स रणनीति को बदल रही हैं। अब कंपनियां हर मॉडल पर एक जैसी छूट देने के बजाय, कैश डिस्काउंट, एक्सचेंज बोनस और फाइनेंसिंग ऑफर्स का स्मार्ट कॉम्बिनेशन इस्तेमाल कर रही हैं, ताकि ब्रांड वैल्यू बनी रहे और स्टॉक भी निकलता रहे।
होलसेल बनाम रिटेल का गणित
सितंबर के आंकड़े काफी मजबूत दिखे हैं। Maruti Suzuki की बिक्री में 37% का उछाल आया है और कुल 1,81,838 यूनिट्स बिकी हैं, वहीं Hyundai ने अब तक की अपनी सबसे अधिक 77,916 यूनिट्स की मासिक बिक्री दर्ज की है। लेकिन निवेशकों के लिए असली चुनौती 'होलसेल' (कंपनियों से डीलर तक पहुंचना) और 'रिटेल' (ग्राहकों द्वारा खरीद) के बीच का फासला है।
इन्वेंट्री का बड़ा रिस्क
फिलहाल कई डीलर्स के पास 4 से 5 सप्ताह का स्टॉक जमा हो चुका है। अगर रिटेल मांग में तेजी नहीं आई, तो यह इन्वेंट्री ओवरहैंग कंपनी के मार्जिन को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। इससे बचने के लिए कंपनियां प्रोडक्शन में कटौती या भविष्य में और अधिक डिस्काउंट देने को मजबूर हो सकती हैं।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
ऑटो कंपनियां फिलहाल 'प्राइस वॉर' से बचने के लिए स्पेसिफिक वेरिएंट्स पर ऑफर दे रही हैं ताकि उनका एवरेज सेलिंग प्राइस (ASP) बना रहे। अब बाजार की नजरें दिवाली के बाद आने वाले सेल्स डेटा पर टिकी हैं। अगर रिटेल रजिस्ट्रेशन होलसेल आंकड़ों से पीछे रह जाते हैं, तो यह बाजार के सैचुरेशन पॉइंट तक पहुंचने का संकेत हो सकता है। आने वाले महीनों में कंपनियों की कमेंट्री और प्रोडक्शन शेड्यूल पर नजर रखना बेहद जरूरी होगा।
