ऑटो सेक्टर में AI का दौर चल रहा है और करीब **70%** कंपनियां रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) में इसे अपना रही हैं। लेकिन, खराब गवर्नेंस के चलते ज्यादातर कंपनियां सिर्फ पायलट प्रोजेक्ट्स तक ही सीमित हैं। केवल **5%** कंपनियों के पास ही इतना मजबूत ढांचा है कि वे मार्जिन को बूस्ट कर सकें।
ग्लोबल ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री इस समय बड़े तकनीकी बदलाव से गुजर रही है। बड़ी संख्या में कंपनियां अपने प्रोडक्ट डेवलपमेंट साइकिल को तेज करने के लिए AI सिस्टम्स लागू कर रही हैं। शेयरधारकों के नजरिए से देखें, तो यह पूरी लड़ाई 'ऑपरेशनल एफिशिएंसी' (Operational Efficiency) की है। जो कंपनियां इसमें सफल रही हैं, उन्होंने अपने डेवलपमेंट साइकिल में 17% की तेजी और इंजीनियरिंग प्रोडक्टिविटी में 19% का उछाल दर्ज किया है। अगर यह ट्रेंड बना रहता है, तो कंपनियों की लागत घटेगी और नए व्हीकल मॉडल्स जल्दी मार्केट में आएंगे।
गवर्नेंस का गैप और फाइनेंशियल रिस्क
इंडस्ट्री में लीडर्स और बाकी कंपनियों के बीच एक बड़ा गैप दिख रहा है। डेटा के मुताबिक, केवल 5% ऑटो कंपनियां ही ऐसी हैं जिनके पास मैच्योर AI गवर्नेंस प्रोटोकॉल हैं। इनके बिना, कंपनियां डेटा की क्वालिटी और जवाबदेही के मामले में संघर्ष कर रही हैं, जिससे उनके AI प्रोजेक्ट्स पैसे बर्बाद करने वाले पायलट प्रोग्राम बनकर रह गए हैं। निवेशकों के लिए यहाँ मुख्य रिस्क 'कैपिटल एलोकेशन' का है। अगर कंपनियां अपने डेटा को बिना व्यवस्थित किए AI में पैसा लगा रही हैं, तो निवेश पर मिलने वाला रिटर्न (ROI) निराशाजनक रह सकता है।
क्या देखें निवेशक?
अभी स्थिति यह है कि कंपनियां AI का इस्तेमाल रिसर्च के लिए तो कर रही हैं, लेकिन सेफ्टी-क्रिटिकल डेवलपमेंट में इसे लागू करने से बच रही हैं। आने वाले क्वार्टर्स में निवेशकों को कंपनियों की 'डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन' स्ट्रैटेजी पर नजर रखनी चाहिए। यह देखना जरूरी होगा कि क्या कंपनी के पास सप्लाई चेन में AI को इंटीग्रेट करने वाला डेटा आर्किटेक्चर है, या वे सिर्फ पायलट प्रोजेक्ट्स की संख्या बढ़ाकर दिखा रहे हैं। भविष्य में वही कंपनियां जीतेंगी जो AI को मार्जिन बढ़ाने के एक टूल के रूप में साबित कर सकेंगी।
