FY27 की पहली तिमाही में भारतीय ऑटो कंपनियों की डिमांड में **24.5%** का उछाल आया है। बिक्री बढ़ने के बावजूद, बढ़ती रॉ मैटेरियल कॉस्ट (Raw Material Cost) की वजह से मुनाफे पर दबाव देखने को मिल सकता है। निवेशकों को यह देखना होगा कि विभिन्न सेगमेंट्स इनपुट कॉस्ट को कैसे मैनेज करते हैं।
ऑटो सेक्टर में दिखी बंपर डिमांड
चालू फाइनेंशियल ईयर की शुरुआत भारतीय ऑटो इंडस्ट्री के लिए शानदार रही है। FY27 की पहली तिमाही में वॉल्यूम ग्रोथ 24.5% सालाना (Year-on-Year) दर्ज की गई है। हालांकि, रिटेल डिमांड तो मजबूत बनी हुई है, लेकिन बढ़ती लागत ऑटो कंपनियों के मुनाफे पर भारी पड़ रही है। पिछले फाइनेंशियल ईयर के आखिरी हिस्से से ही रॉ मैटेरियल (कच्चे माल) की कीमतें बढ़ रही हैं, जिसका सीधा असर अब प्रॉफिट मार्जिन पर दिख रहा है।
सेगमेंट्स के हिसाब से परफॉर्मेंस
सेल्स में सबसे आगे टू-व्हीलर सेगमेंट रहा, जिसमें 26% की ग्रोथ देखी गई। पैसेंजर व्हीकल्स (PV) में 24% की बढ़ोतरी हुई, जबकि कमर्शियल व्हीकल (CV) सेगमेंट में 20% और ट्रैक्टर सेगमेंट में 18% की ग्रोथ दर्ज की गई। बिक्री में यह उछाल कंज्यूमर की मजबूत मांग को दिखाता है।
मार्जिन पर पड़ेगा असर?
अच्छी रेवेन्यू ग्रोथ के अनुमानों के बावजूद, प्रॉफिट मार्जिन पर सिकुड़न का खतरा मंडरा रहा है। इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक, EBITDA मार्जिन (ऑपरेटिंग एफिशिएंसी का पैमाना) सालाना आधार पर लगभग 190 बेसिस पॉइंट्स घटकर 9.6% तक आ सकता है। कमर्शियल व्हीकल और पैसेंजर व्हीकल बनाने वाली कंपनियों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ने की आशंका है, जिनके मार्जिन में 100 से 200 बेस पॉइंट्स तक की गिरावट आ सकती है।
ऑटो कंपोनेंट्स बनाने वाली कंपनियां भी इस मार को झेल रही हैं। हालांकि, इनके रेवेन्यू में करीब 15% की ग्रोथ की उम्मीद है, लेकिन प्रॉफिट आफ्टर टैक्स (PAT) में ग्रोथ घटकर 10% रहने का अनुमान है। कुछ टू-व्हीलर कंपनियों को एक्सपोर्ट मार्केट से फायदा मिल सकता है, लेकिन कुल मिलाकर इंडस्ट्री में मार्जिन टाइट होने की संभावना है।
निवेशकों के लिए आगे क्या?
शेयरहोल्डर्स के लिए यह देखना अहम होगा कि क्या कंपनियां अपनी एफिशिएंसी बढ़ाकर बढ़ी हुई लागत को मैनेज कर पाती हैं या उन्हें कीमतें बढ़ानी पड़ती हैं। आने वाली तिमाही नतीजों में पता चलेगा कि मार्जिन में यह गिरावट कितनी वास्तविक है।
