सितंबर 2026 में ऑटो रिटेल सेल्स ने **2.54 मिलियन** यूनिट्स का रिकॉर्ड बनाया है, लेकिन डीलर्स के पास गाड़ियों का स्टॉक बढ़कर **43-45 दिन** के लेवल पर पहुंच गया है। क्या फेस्टिव सीजन में यह स्टॉक बिक पाएगा या कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ेगा, यह बड़ा सवाल है।
भारतीय ऑटोमोबाइल सेक्टर के लिए फाइनेंशियल ईयर 2027 की पहली छमाही मिले-जुले संकेतों के साथ खत्म हुई है। फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (FADA) के आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर 2026 में देश भर में कुल रिटेल सेल्स 2.54 मिलियन यूनिट्स रही, जो सालाना आधार पर 31.82% का उछाल है। पैसेंजर व्हीकल्स की सेल्स भी 427,213 यूनिट्स के ऑल-टाइम हाई पर रही है। हालांकि, बाजार के जानकार मानते हैं कि यह ग्रोथ सितंबर 2025 के 'लो बेस' इफेक्ट का असर है, यानी असल डिमांड रिकवरी इतनी बड़ी नहीं है जितनी दिख रही है।
इन्वेंट्री का बढ़ता बोझ
इंडस्ट्री के लिए सबसे बड़ी चिंता डीलर्स के पास खड़ी गाड़ियों का स्टॉक है। FADA की रिपोर्ट के अनुसार, पैसेंजर व्हीकल्स के लिए इन्वेंट्री लेवल 43-45 दिन तक पहुंच गया है, जबकि हेल्दी बेंचमार्क सिर्फ 21 दिन माना जाता है। निवेशकों के नजरिए से यह एक रेड फ्लैग है। अगर फेस्टिव सीजन में यह स्टॉक नहीं निकला, तो कंपनियों को या तो प्रोडक्शन कम करना पड़ेगा या भारी डिस्काउंट देने पड़ेंगे, जिसका सीधा असर कंपनी के मुनाफे और मार्जिन पर पड़ेगा।
कंपनियों की प्राइसिंग रणनीति
इस बीच, Maruti Suzuki, Hyundai Motor India और Tata Motors जैसी प्रमुख कंपनियों ने साल 2026 में अब तक 3 राउंड में कीमतें बढ़ाई हैं। कंपनियों का कहना है कि इनपुट कॉस्ट और सप्लाई चेन की दिक्कतें इसकी वजह हैं, लेकिन डीलर्स का मानना है कि गाड़ियों की कीमतें अब कंज्यूमर की जेब पर भारी पड़ने लगी हैं।
फेस्टिव सीजन बना 'अग्निपरीक्षा'
तमाम मुश्किलों के बावजूद, करीब 75.57% डीलर्स को अक्टूबर में डिमांड बढ़ने की उम्मीद है। नवरात्रि और दशहरे के दौरान आने वाली खरीदारी अब सेक्टर के लिए एक 'स्ट्रेस टेस्ट' की तरह है। आने वाले हफ्तों में यह साफ हो जाएगा कि क्या ग्राहक महंगी गाड़ियों को खरीदने के लिए तैयार हैं, या रिकॉर्ड हाई इन्वेंट्री के कारण ऑटो कंपनियों की मुसीबतें और बढ़ेंगी।
