भारत का व्हीकल स्क्रैपेज प्रोग्राम बड़े संकट में है। वित्त वर्ष 2026 के लक्ष्यों में **70%** की भारी गिरावट दर्ज की गई है। इस चुनौती से निपटने के लिए Tata Motors और Mahindra & Mahindra अब AI-आधारित डिजिटल समाधानों की मांग कर रहे हैं ताकि कागजी बाधाओं को कम किया जा सके।
क्या है आंकड़ों का गणित?
भारत के व्हीकल रिसाइक्लिंग मिशन को बड़ा झटका लगा है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 का लक्ष्य 7.62 लाख गाड़ियों को रिसाइकिल करने का था, लेकिन हकीकत में केवल 2.42 लाख गाड़ियाँ ही रिसाइकिल हो पाईं। यह लक्ष्य से करीब 70% की बड़ी कमी है।
क्यों फेल हो रहा है फॉर्मल सिस्टम?
इस असफलता के पीछे की बड़ी वजह 'एंड-ऑफ-लाइफ व्हीकल' (ELV) नियमों में मार्च 2026 में हुआ बदलाव है। अब EPR (एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी) अनुपालन के लिए केवल गाड़ी से निकले स्टील को ही मान्यता दी जा रही है, न कि सामान्य स्टील स्क्रैप को। इसके अलावा, स्थानीय अनौपचारिक (informal) स्क्रैप यार्ड्स ग्राहकों को अधिक सुविधा देते हैं, जबकि सरकारी चैनल्स में भारी कागजी कार्रवाई और समय की बर्बादी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
AI कैसे बनेगा गेम-चेंजर?
टाटा मोटर्स और महिंद्रा जैसे बड़े प्लेयर्स अब 'AI बैकबोन' की वकालत कर रहे हैं। इसका मकसद दो मुख्य समस्याओं को हल करना है:
- डिजिटल इंटीग्रेशन: सरकारी रजिस्ट्रेशन और रिसाइक्लिंग सेंटर्स के बीच कागजी काम को पूरी तरह ऑटोमेट करना।
- AI विजन सिस्टम: रिसाइक्लिंग केंद्रों पर स्कैप को बेहतर तरीके से अलग (categorize) करना, जिससे मटेरियल की वैल्यू बढ़ सके।
निवेशकों के लिए जोखिम
कंपनियों ने इन रिसाइक्लिंग प्लांट्स में भारी निवेश किया है। जब तक गाड़ियों का फ्लो नहीं बढ़ेगा, इन प्लांट्स का रिटर्न दबाव में रहेगा। सरकार ने कंपनियों से ग्राहकों को 5% तक का डिस्काउंट देने को कहा है, लेकिन जब तक पूरी प्रक्रिया डिजिटल और आसान नहीं होगी, तब तक इन लक्ष्यों को पाना मुश्किल दिख रहा है। निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि क्या सरकार इन डिजिटल सुधारों को मंजूरी देती है या नहीं, क्योंकि यह कंपनियों की ऑपरेशनल कॉस्ट के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
