भारतीय ऑटो डीलर्स अब मैन्युफैक्चरर-लिंक्ड लोन से हटकर, अपने वित्तीय प्रदर्शन पर आधारित इंडिपेंडेंट क्रेडिट मॉडल की मांग कर रहे हैं। इस साल 3 करोड़ यूनिट की बिक्री के लक्ष्य के साथ, डीलर्स को वर्किंग कैपिटल मैनेजमेंट के लिए तेज, डिजिटल-फर्स्ट फाइनेंसिंग की जरूरत है। इसका मकसद कंपनियों पर निर्भरता कम करना और रियल-टाइम डिजिटल प्लेटफॉर्म से लिक्विडिटी बढ़ाना है।
ऑटो रिटेल सेक्टर में बड़ा बदलाव
इस फाइनेंशियल ईयर में भारतीय ऑटो रिटेल सेक्टर 3 करोड़ व्हीकल बिक्री का बड़ा मुकाम हासिल करने की ओर बढ़ रहा है। इस भारी मात्रा में होने वाली बिक्री को देखते हुए, इसके सपोर्ट में मौजूद फाइनेंसियल इंफ्रास्ट्रक्चर में भी बड़ा बदलाव आ रहा है। फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (FADA) ने अब फाइनेंसिंग और इंश्योरेंस पार्टनरशिप को लेकर अहम बदलावों की वकालत की है।
इंडिपेंडेंट फाइनेंस की मांग क्यों?
वर्तमान में डीलर्स मैन्युफैक्चरर-लिंक्ड (OEM-बेस्ड) लेंडिंग मॉडल पर काफी निर्भर हैं। लेकिन अब वे चाहते हैं कि क्रेडिट का फैसला डीलरशिप की अपनी वित्तीय ताकत, प्रॉफिटेबिलिटी और पेमेंट हिस्ट्री के आधार पर हो, न कि सिर्फ ब्रांड के आधार पर। डीलर्स का मानना है कि इससे उन्हें इन्वेंटरी फंडिंग की बड़ी जरूरतों को मैनेज करने में ज्यादा ऑटोनॉमी और बेहतर शर्तें मिलेंगी।
डीलर-सेंट्रिक डिजिटल फाइनेंस की ओर कदम
हाल ही में हुए FADA बैंकिंग एंड इंश्योरेंस समिट में, इंडस्ट्री के लीडर्स ने कहा कि डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन का अगला कदम सिर्फ लोन प्रोसेसिंग से कहीं आगे जाना चाहिए। जहां AI-लेड अंडरराइटिंग और e-KYC से लोन अप्रूवल टाइम कुछ दिनों से मिनटों में आया है, वहीं अब फोकस पूरी तरह से इंटीग्रेटेड डिजिटल इकोसिस्टम बनाने पर है। डीलर्स रियल-टाइम फंडिंग डैशबोर्ड चाहते हैं, जो क्रेडिट लिमिट, इंटरेस्ट कॉस्ट और ट्रांजैक्शन हिस्ट्री की तुरंत जानकारी दे सकें। यह बदलाव वर्किंग कैपिटल मैनेजमेंट को बेहतर बनाने के लिए जरूरी है, ताकि वे पीरियोडिक स्टेटमेंट्स की जगह लगातार अपडेट होने वाले डिजिटल इंटरफेस का इस्तेमाल कर सकें।
फाइनेंसिंग और इंश्योरेंस की चुनौतियां
ऑपरेशनल एफिशिएंसी में सुधार के बावजूद, जैसे कि FADA के फाइनेंस सेटिस्फेक्शन स्कोर का 841 तक पहुंचना और रिटेल फंडिंग का लगभग 80% रिटेल तक पहुंचना, डीलर्स को अभी भी दिक्कतें आ रही हैं। इंश्योरेंस प्रोसेसिंग में सुधार की जरूरत है। क्लेम टर्नअराउंड टाइम कम हुआ है, लेकिन 65% डीलर्स अभी भी सर्वे अपॉइंटमेंट और क्लेम अप्रूवल की स्पीड को लेकर परेशान हैं। टाटा कैपिटल और आईसीआईसीआई लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस जैसी वित्तीय संस्थाओं के एक्सपर्ट्स ने इन चिंताओं को स्वीकार किया है और क्लेम प्रोसेस में ट्रांसपेरेंसी बढ़ाने के लिए इंडस्ट्री के प्रयासों पर जोर दिया है।
यह बदलाव निवेशकों के लिए अहम हैं क्योंकि यह सीधे तौर पर डीलरशिप के ऑपरेशनल मार्जिन को प्रभावित करते हैं। अगर ये डिजिटल इंटीग्रेशन और ट्रांसपेरेंसी पहल सफल होती हैं, तो इंटरेस्ट कॉस्ट कम करके और इन्वेंटरी या पेंडिंग क्लेम में फंसे कैपिटल को कम करके रिटेल नेटवर्क के ओवरऑल फाइनेंशियल हेल्थ को सुधारा जा सकता है। डीलर्स की इंडिपेंडेंट, परफॉरमेंस-बेस्ड फाइनेंसिंग हासिल करने की क्षमता एक अहम फैक्टर बनी रहेगी, क्योंकि इससे सेक्टर-वाइड डिमांड के उतार-चढ़ाव के खिलाफ उनकी मजबूती बढ़ सकती है।
