नीति आयोग के पूर्व CEO अमिताभ कांत ने नए CAFE III नियमों पर सवाल खड़े किए हैं। उनका मानना है कि ये नियम इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) के बजाय हाइब्रिड और अन्य विकल्पों को अधिक महत्व देते हैं, जिससे भारत में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की रफ्तार सुस्त हो सकती है।
सरकार के नए कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल इकोनॉमी (CAFE III) नॉर्म्स पर अब बहस छिड़ गई है। अमिताभ कांत का तर्क है कि ये नियम इलेक्ट्रिक वाहनों को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं दे रहे हैं, जिससे क्लीन मोबिलिटी की दिशा में हो रहा ट्रांजिशन धीमा पड़ सकता है। हालांकि पावर मिनिस्ट्री इसे 'टेक्नोलॉजी-न्यूट्रल' बता रही है, लेकिन कांत के अनुसार यह छूट तेजी से विद्युतीकरण (Electrification) की राह में रोड़ा है।
कैसे काम करेंगे ये नियम?
CAFE III के तहत कंपनियों को अपने पूरे फ्लीट के लिए एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी का लक्ष्य हासिल करना होगा। नए ढांचे में बैटरी-इलेक्ट्रिक वाहनों को सबसे ज्यादा इंसेंटिव दिए गए हैं, लेकिन साथ ही प्लग-इन हाइब्रिड, स्ट्रांग हाइब्रिड और इथेनॉल पर चलने वाले वाहनों को भी क्रेडिट मिल रहा है। इससे कंपनियां पूरी तरह बैटरी पर शिफ्ट होने के बजाय हाइब्रिड तकनीक के जरिए अपने टारगेट पूरे कर पाएंगी।
निवेशकों के लिए क्या है मायने?
यह डिबेट ऑटो सेक्टर के निवेशकों के लिए काफी अहम है क्योंकि अलग-अलग कंपनियां अलग रास्ते अपना रही हैं:
- Tata Motors और Mahindra & Mahindra: इनका पूरा जोर इलेक्ट्रिक प्लेटफॉर्म्स पर है।
- Maruti Suzuki और Toyota: ये कंपनियां हाइब्रिड तकनीक को बड़ा बढ़ावा दे रही हैं।
सरकार की 'टेक्नोलॉजी-न्यूट्रल' नीति हाइब्रिड में निवेश करने वाली कंपनियों के लिए फायदेमंद है, क्योंकि उन्हें तुरंत भारी कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसके अलावा, ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी (BEE) द्वारा मैनेज किए जाने वाले क्रेडिट सिस्टम में भी अमिताभ कांत ने संभावित हितों के टकराव (Conflict of interest) की ओर इशारा किया है, जो भविष्य में कंपनियों की कंप्लायंस कॉस्ट को प्रभावित कर सकता है। निवेशकों की नजर अब इस पर होगी कि क्या सरकार इन नियमों को सख्त करेगी या इसी लचीलेपन को बरकरार रखा जाएगा।
