1 अप्रैल, 2029 से लागू होने वाले AIS-101 Revision 1 सेफ्टी मैंडेट से भारतीय ऑटो सेक्टर की चुनौतियां बढ़ेंगी। रियर-क्रैश सुरक्षा मानकों के अपग्रेड के कारण कंपनियों पर ₹2,700 करोड़ का अतिरिक्त सालाना बोझ पड़ने का अनुमान है।
भारत सरकार ने पैसेंजर गाड़ियों के लिए नए सेफ्टी नियम AIS-101 Revision 1 को मंजूरी दी है, जो 1 अप्रैल, 2029 से प्रभावी होंगे। इस नए नियम का मुख्य मकसद रियर-इम्पैक्ट प्रोटेक्शन को मजबूत करना है, जिसके लिए कंपनियों को गाड़ियों के पिछले ढांचे, फ्यूल-सिस्टम शील्डिंग और बैटरी एनक्लोजर में बड़े बदलाव करने होंगे।
कंपनियों पर कितना पड़ेगा वित्तीय भार?
इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक, इन बदलावों से ऑटो सेक्टर पर हर साल ₹2,700 करोड़ का अतिरिक्त खर्च आएगा। हर गाड़ी की प्रोडक्शन कॉस्ट में औसतन ₹5,450 की बढ़ोतरी होना तय माना जा रहा है। इसमें हार्डवेयर अपग्रेड के साथ-साथ रिसर्च, री-टूलिंग और सर्टिफिकेशन का भारी खर्च भी शामिल है।
बजट सेगमेंट और EV पर सबसे ज्यादा दबाव
सबसे बड़ी चिंता बजट कारों और इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) को लेकर है। एंट्री-लेवल कारों में पहले ही मार्जिन बहुत कम होता है, ऐसे में प्रति कार ₹5,000 तक की लागत बढ़ना कंपनियों के लिए मुसीबत बन सकता है। वहीं, इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड वाहनों के लिए यह चुनौती और बड़ी है। इन गाड़ियों में बैटरी प्रोटेक्शन और हाई-वोल्टेज सिस्टम की सुरक्षा के लिए ₹15,000 प्रति यूनिट तक का अतिरिक्त खर्च आने की उम्मीद है। कंपनियों के सामने अब यह दुविधा है कि क्या वे इस लागत का बोझ खुद सहें या फिर गाड़ियों की कीमतें बढ़ाकर ग्राहकों पर डालें।
कंपोनेंट सप्लायर्स के लिए सुनहरा मौका
जहां ऑटोमेकर्स दबाव में हैं, वहीं ऑटो-कंपोनेंट बनाने वाली कंपनियों के लिए यह एक बड़ा अवसर है। स्ट्रक्चरल स्टील, प्रोटेक्टिव हाउसिंग और सेफ्टी असेंबली बनाने वाली कंपनियों को आने वाले समय में डिमांड में भारी उछाल की उम्मीद है। 2029 की डेडलाइन नजदीक आते ही टूलिंग और टेस्टिंग सर्विस के कॉन्ट्रैक्ट्स में बढ़ोतरी देखी जा सकती है।
अब देखना यह होगा कि कंपनियां कितनी कुशलता से प्रोडक्शन लोकलाइजेशन करती हैं और अपने कैपिटल एक्सपेंडिचर को मैनेज करती हैं। निवेशकों की नजर अब कंपनियों के मैनेजमेंट कमेंट्री और मार्जिन पर पड़ने वाले असर पर टिकी रहेगी।
