क्यों खेती पर मंडरा रहा वन्यजीवों का संकट?
भारत में खेती-किसानी पर वन्यजीवों का आतंक लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे किसानों की जेब पर हर साल ₹40,000 करोड़ तक की भारी मार पड़ रही है। यह समस्या सिर्फ फसलों के बर्बाद होने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके अप्रत्यक्ष आर्थिक प्रभाव किसानों की कमर तोड़ रहे हैं। असल वजह ये है कि कई सालों से शिकार पर लगी रोक के कारण वन्यजीव अब इंसानों से डरते नहीं हैं। इस वजह से वे इंसानी बस्तियों और खेतों के करीब आ जाते हैं, और अपनी भूख मिटाने के लिए फसलों को निशाना बनाते हैं।
महाराष्ट्र से कर्नाटक तक, हर जगह एक जैसा हाल
इस समस्या का असर पूरे देश में दिख रहा है। महाराष्ट्र में ही सालाना नुकसान ₹10,000 करोड़ से लेकर ₹40,000 करोड़ तक पहुंच रहा है। वहीं, तमिलनाडु के प्रभावित इलाकों में हर किसान को हर साल ₹50,000 से ₹1,50,000 तक का नुकसान उठाना पड़ रहा है। कर्नाटक में भी हालत कुछ ऐसी ही है, जहां एक परिवार को औसतन ₹66,128 का सालाना नुकसान होता है, और कॉफी बागानों को उनके पूरे आर्थिक जीवनकाल में ₹12,60,002 तक की हानि झेलनी पड़ती है। इन नुकसानों के कारण कई किसान खेती छोड़ रहे हैं या कम मुनाफे वाली फसलें उगाने पर मजबूर हो रहे हैं।
सरकारी नीतियां क्यों नहीं कर रहीं असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि वन्यजीवों से होने वाले नुकसान का सही आकलन करने के तरीके और उन्हें रोकने के उपाय फिलहाल पर्याप्त नहीं हैं। मौजूदा व्यवस्थाओं में अक्सर सिर्फ सीधे तौर पर दिखने वाले नुकसान को ही गिना जाता है, जबकि फसलों को अंदर से होने वाले नुकसान या शुरुआती अवस्था में हुई क्षति को नजरअंदाज कर दिया जाता है। भारत में वन्यजीव संरक्षण के सख्त कानून, जो प्रजातियों की आबादी बढ़ाने में सफल रहे हैं, वहीं कुछ शाकाहारी जानवरों की आबादी इतनी बढ़ गई है कि वे खेतों के लिए खतरा बन गए हैं।
समाधान की राह में बाधाएं
कई देशों में इस समस्या से निपटने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाए जाते हैं, जैसे कि पर्यटन से कमाई करना या नियंत्रित शिकार की अनुमति देना। लेकिन भारत में, वन्यजीवों को इंसानों से दूर रखने की पुरानी नीति कहीं न कहीं नाकाम साबित हो रही है। बचाव के जो तरीके अपनाए जा रहे हैं, जैसे कि बाड़ लगाना, वे भी अक्सर जानवरों को रोकने में नाकाम रहते हैं। इसके अलावा, मुआवजे के नियम-कानून बहुत पेचीदा और समय लेने वाले हैं, जिससे किसानों को तुरंत मदद नहीं मिल पाती। इस तरह, भले ही खेती को आधुनिक बनाने के प्रयास चल रहे हों, लेकिन वन्यजीवों के बढ़ते आतंक से होने वाला यह आर्थिक नुकसान, ग्रामीण अर्थव्यवस्था की प्रगति में एक बड़ी बाधा बना हुआ है।