Cold Chain Infrastructure: कैसे 'कोलैटरल मैनेजमेंट' से बदलेगी भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था?

AGRICULTURE
Whalesbook Logo
AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Cold Chain Infrastructure: कैसे 'कोलैटरल मैनेजमेंट' से बदलेगी भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था?

भारत में बंपर पैदावार के बावजूद **15%** फसलें खराब हो जाती हैं। अब प्रोफेशनल 'कोलैटरल मैनेजमेंट' इस खाई को भर रहा है, जिससे खराब होने वाली फसलों को बैंकों में गिरवी रखकर लोन लेना आसान हो गया है।

भारत का कृषि सेक्टर लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है। साल 2024–25 के दौरान देश में 357.73 मिलियन टन अनाज और 362.08 मिलियन टन बागवानी उपज का उत्पादन हुआ है। लेकिन, NABCONS और Ministry of Food Processing Industries की रिपोर्ट के अनुसार, सही लॉजिस्टिक्स न होने के कारण हर साल 15% फल और सब्जियां खराब हो जाती हैं।

बैंकिंग की समस्या और समाधान

अब तक बैंक खराब होने वाली चीजों (perishables) को कोलैटरल के रूप में स्वीकार करने से कतराते थे, क्योंकि उन्हें जोखिम ज्यादा दिखता था। इसी वजह से किसानों को हार्वेस्ट के तुरंत बाद अपनी उपज सस्ते में बेचनी पड़ती थी। अब कोलैटरल मैनेजमेंट सर्विस एक तीसरे पक्ष के रूप में सामने आई है जो बैंक और किसान के बीच भरोसा कायम करती है। ये एजेंसियां माल की कस्टडी लेती हैं और तापमान की निगरानी करती हैं, जिससे बैंक के लिए इसे 'बैंकएबल एसेट' बनाना संभव हो जाता है।

टेक्नोलॉजी का रोल

आजकल IoT सेंसर का इस्तेमाल करके आर्द्रता (humidity) और तापमान की रियल-टाइम मॉनिटरिंग की जा रही है। यह डेटा बैंक के लिए ऑडिट ट्रेल की तरह काम करता है, जिससे चोरी या खराब होने का जोखिम न्यूनतम हो जाता है। इसके चलते अब किसान अपनी उपज को होल्ड कर सकते हैं और सही दाम मिलने का इंतज़ार कर सकते हैं।

रिस्क और भविष्य

हालांकि, पूरा सेक्टर टेक्नोलॉजी पर निर्भर है, इसलिए सिस्टम में खराबी आने पर नुकसान का डर बना रहता है। लेकिन यदि यह मॉडल सफल रहता है, तो कोल्ड स्टोरेज के विस्तार में भारी इन्वेस्टमेंट आएगा और भारत की सप्लाई चेन में क्रांति आ सकती है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.