Indian Tea Association ने पश्चिम बंगाल सरकार से दार्जीलिंग चाय सेक्टर को उबारने के लिए एक फाइनेंशियल सपोर्ट पैकेज की मांग की है। चाय उत्पादन के बहु-दशकीय निचले स्तर पर पहुंचने और बढ़ती लागत के चलते इंडस्ट्री गहरे संकट में है।
उत्तर बंगाल की चाय इंडस्ट्री, जो भारत की एग्रो-इकोनॉमी का एक बड़ा आधार है, इस समय गहरे स्ट्रक्चरल संकट से जूझ रही है। Indian Tea Association (ITA) ने आधिकारिक रूप से पश्चिम बंगाल सरकार के सामने एक बड़े फाइनेंशियल एड पैकेज का प्रस्ताव रखा है। यह कदम दार्जीलिंग रीजन में उत्पादन की लगातार गिरावट को देखते हुए उठाया गया है, जहां प्रोडक्शन 1990 में 14.49 मिलियन किलोग्राम से घटकर 2025 में मात्र 5.6 मिलियन किलोग्राम रह गया है।
मॉडर्नाइजेशन और सपोर्ट पर जोर
इंडस्ट्री ने दार्जीलिंग चाय सेक्टर के लिए लगभग ₹113 करोड़ की सहायता राशि मांगी है। इस फंड का इस्तेमाल प्रोविडेंट फंड योगदान, ऑर्थोडॉक्स चाय की ब्रांडिंग और वर्किंग कैपिटल पर इंटरेस्ट सबवेंशन के लिए किया जाएगा। साथ ही, फैक्ट्रियों के मॉडर्नाइजेशन और मशीनीकृत हार्वेस्टिंग (mechanized harvesting) को बढ़ावा देने की मांग की गई है ताकि बढ़ते खर्चों पर काबू पाया जा सके।
बढ़ती लागत और चुनौतियां
इंडस्ट्री के सामने केवल लिक्विडिटी का ही नहीं, बल्कि पुराने बागानों और बदलते क्लाइमेट का भी बड़ा संकट है। बेमौसम बारिश और तापमान में बदलाव ने चाय की झाड़ियों की सेहत पर बुरा असर डाला है। इसके अलावा, लेबर कॉस्ट में बढ़ोतरी और सस्ती चाय के इंपोर्ट से मार्जिन पर गहरा दबाव है। साथ ही, पेस्टिसाइड रेजिड्यू स्टैंडर्ड्स के कड़े नियमों के कारण भी फैक्ट्रियों को कच्चा माल खरीदने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
व्यापक असर और भविष्य
यह संकट केवल दार्जीलिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि Dooars और Terai क्षेत्र के उत्पादक भी भारी वित्तीय तंगी से गुजर रहे हैं। एसोसिएशन ने चाय व्यापार को 'सीजनल इंडस्ट्री' के रूप में फिर से क्लासिफाई करने का सुझाव दिया है, ताकि कामकाज के नियमों में लचीलापन आए। अब सभी की नजरें इस पर टिकी हैं कि क्या सरकार इन मांगों को मानती है या नहीं, क्योंकि इस आइकॉनिक सेक्टर की साख बचाना समय की मांग बन गया है।
