West Bengal में आलू के बंपर प्रोडक्शन और कोल्ड स्टोरेज में भरे स्टॉक के कारण होलसेल भाव बुरी तरह गिरे हैं। मुनाफे में कमी के चलते किसान अब खेती कम कर रहे हैं, जिसका असर भविष्य की सप्लाई पर पड़ सकता है।
मुनाफे का संकट
West Bengal में आलू की खेती करने वाले किसान इस वक्त दोहरी मार झेल रहे हैं। पिछले सीजन में 140 लाख टन के बंपर उत्पादन के कारण कोल्ड स्टोरेज हाउसों में रिकॉर्ड स्टॉक जमा हो गया है। स्थिति इतनी खराब है कि किसानों को अपनी लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है। 'ज्योति' वैरायटी का भाव फैक्टरी-गेट पर ₹500 प्रति क्विंटल के आसपास है, जिससे किसानों को प्रति क्विंटल महज ₹150 से ₹170 का ही नेट प्रॉफिट मिल पा रहा है। वहीं, कोलकाता की थोक मंडियों में भाव पिछले साल के ₹15 प्रति किलो के मुकाबले घटकर ₹11 से ₹12 प्रति किलो पर आ गए हैं।
बाजार का मुकाबला
वेस्ट बंगाल कोल्ड स्टोरेज एसोसिएशन और पश्चिम बंगाल प्रगतिशील आलू व्यवसायी समिति का कहना है कि राज्य के आलू बाजार को बाहरी राज्यों से कड़ी टक्कर मिल रही है। पुरानी पाबंदियों के कारण उत्तर प्रदेश के किसानों ने ओडिशा, बिहार, झारखंड और असम जैसे पारंपरिक बाजारों में मजबूत पकड़ बना ली है। हालांकि, राज्य सरकार ने रेलवे के जरिए ₹100 प्रति क्विंटल की ट्रांसपोर्ट सब्सिडी दी है, लेकिन व्यापारी मांग कर रहे हैं कि कोल्ड स्टोरेज में पड़े बचे हुए 37 से 38 प्रतिशत स्टॉक को निकालने के लिए रोड ट्रांसपोर्ट सब्सिडी भी जरूरी है।
भविष्य की चिंता
साल 2025-26 में आलू की खेती 5 लाख हेक्टेयर जमीन पर की गई थी, लेकिन किसानों की मौजूदा लिक्विडिटी क्रंच के कारण इस साल बुवाई का रकबा काफी कम होने की आशंका है। निवेशकों और मार्केट पर नजर रखने वालों को अब कोल्ड स्टोरेज में इन्वेंट्री के लेवल और सरकार के नए कदमों पर ध्यान देना होगा, क्योंकि यही फैक्टर आने वाले सीजन में आलू की कीमतों को दिशा देंगे।
