क्यों उछली LNG की कीमतें?
पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों का सीधा असर एनर्जी मार्केट पर दिख रहा है। कतर की रास लफन (Ras Laffan) सुविधा जैसे महत्वपूर्ण सप्लायर्स प्रभावित हुए हैं। इस संकट के चलते एशिया में स्पॉट LNG की कीमतें $20/MMBtu के करीब या उससे भी ऊपर पहुंच गई हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आसपास की घटनाओं और ईरान की गतिविधियों ने क्षेत्रीय ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर को भी प्रभावित किया है, जिससे मार्केट में अनिश्चितता बनी हुई है।
फर्टिलाइजर प्रोडक्शन को प्राथमिकता
कीमतों में इस भारी उछाल के बीच, भारत सरकार की पहली प्राथमिकता महत्वपूर्ण उद्योगों के लिए गैस की उपलब्धता सुनिश्चित करना है, खासकर फर्टिलाइजर उत्पादन के लिए। सप्लाई में कटौती को देखते हुए, भारतीय एजेंसियों ने तुरंत एक्शन लिया है।
उन्होंने करीब 7.3 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर प्रति दिन (MMSCMD) अतिरिक्त गैस की स्पॉट खरीदारी पहले ही कर ली है, जबकि इंडस्ट्री की कुल मांग 8.6 MMSCMD है। यह कदम इस महीने के अंत तक यूरिया उत्पादन को अनुमानित 12,500-13,000 टन प्रतिदिन बढ़ाने में मदद करेगा, जो औसत उत्पादन स्तर की तुलना में एक संभावित कमी को पूरा करेगा।
भारत की एनर्जी सप्लाई चेन पर खतरा
भारत अपनी प्राकृतिक गैस की खपत का लगभग 50% LNG आयात से पूरा करता है, जो उसे वैश्विक कीमतों के उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक अस्थिरता के प्रति बेहद संवेदनशील बनाता है। इतिहास गवाह है कि एनर्जी की कमी से भारत को हर साल जीडीपी का लगभग 1.9% का नुकसान हुआ है।
जहां पहले फ्लेक्सिबिलिटी के लिए स्पॉट मार्केट को तरजीह दी जाती थी, वहीं अब हालात बदल गए हैं। स्पॉट कीमतें इतनी ज्यादा हो गई हैं कि सरकार लागत से ज़्यादा उपलब्धता पर ध्यान दे रही है।
यह संकट सप्लाई चेन के व्यापक जोखिमों को भी उजागर करता है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जो वैश्विक तेल और LNG व्यापार का लगभग 20% हिस्सा संभालता है, सीधे तौर पर प्रभावित है। भारत के LNG आयात का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 53%) कतर और यूएई से आता है, जो देश को बड़े व्यवधानों के जोखिम में डालता है। कुछ इंडस्ट्री विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर कतर की रास लफन सुविधा को गंभीर नुकसान होता है, तो इसकी मरम्मत में तीन से पांच साल और अरबों डॉलर लग सकते हैं, जिससे यह सप्लाई शॉक लंबा खिंच सकता है।
एनर्जी स्ट्रैटेजी में लंबे समय तक बदलाव की उम्मीद
सरकार द्वारा एनर्जी डेटा को राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला मानना, सप्लाई चेन को मैनेज करने और भू-राजनीतिक झटकों के बीच इन्वेंट्री को बेहतर ढंग से संभालने की दिशा में एक सक्रिय कदम है।
हालांकि वर्तमान आकलन घरेलू उपलब्धता का संकेत देते हैं, आयात पर निर्भरता और पश्चिम एशियाई संघर्ष के चलते एनर्जी की कीमतें ऊंची रहने की संभावना है। भविष्य में, प्रोक्योरमेंट स्ट्रैटेजी लागत-दक्षता से ज़्यादा सप्लाई की स्थिरता और लचीलेपन पर केंद्रित रहेगी। इससे भारत के एनर्जी इंपोर्ट सोर्स में विविधता लाने की कोशिशें तेज होंगी, जिसमें अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से आयात बढ़ाना शामिल है। यह भारत के एनर्जी सिक्योरिटी आउटलुक में एक बड़े दीर्घकालिक बदलाव का संकेत है।
