Urad की खेती का रकबा बढ़कर **18.67 लाख हेक्टेयर** हो गया है, जो पिछले साल से **8%** ज्यादा है। इसकी मुख्य वजह उत्तरी राज्यों में अच्छे दाम और अनुकूल बारिश रही। हालांकि, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में बारिश की कमी ने बुवाई को प्रभावित किया है। अंतिम उत्पादन मौसम पर निर्भर करेगा।
Detailed Coverage
उत्तरी भारत में जोरदार तेजी
इस खरीफ सीजन में Urad (काले माश) की बुवाई वाले रकबे में रिकवरी आई है। 24 जुलाई 2026 तक, कुल बुवाई 18.67 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गई, जो पिछले साल की तुलना में 8% अधिक है। यह वृद्धि मुख्य रूप से उत्तरी और मध्य क्षेत्रों में हुई है, जहां अच्छी बारिश के कारण किसानों ने दालों की खेती की ओर रुख किया है।
बेहतर दाम और कम पानी का फायदा
किसानों को अच्छी बाजार कीमतों ने प्रोत्साहित किया है, जो अन्य फसलों की तुलना में काफी ऊंची बनी हुई हैं। Urad की फसल का चक्र छोटा होता है - आमतौर पर 60 से 80 दिन - और इसमें पानी भी कम लगता है। इसी वजह से यह किसानों के लिए जमीन का बेहतर इस्तेमाल करने का एक आकर्षक विकल्प बन गया है। मध्य प्रदेश इस वृद्धि में सबसे आगे है, जहां खेती का रकबा 13% बढ़कर 6.17 लाख हेक्टेयर हो गया है। उत्तर प्रदेश में तो रकबा 75% उछलकर 4.99 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया, जबकि राजस्थान में 16% की बढ़ोतरी के साथ यह 3.25 लाख हेक्टेयर रहा।
दक्षिणी राज्यों में सूखे का असर
जहां उत्तर में बुवाई बढ़ी है, वहीं राष्ट्रीय आंकड़े कुछ राज्यों की परेशानी को छिपा रहे हैं। मानसून में देरी और अपर्याप्त बारिश ने दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों में कृषि को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। महाराष्ट्र में बुवाई 53% घटकर 1.6 लाख हेक्टेयर रह गई है, जबकि कर्नाटक में 24% की गिरावट के साथ यह 0.71 लाख हेक्टेयर दर्ज की गई। ये दोनों राज्य कुल उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण हैं, और इनके कम उत्पादन की भरपाई उत्तरी फसलों की सफल कटाई पर निर्भर करेगी।
बाजार आपूर्ति पर असर
निवेशकों और व्यापारिक प्रतिभागियों के लिए, इन क्षेत्रीय प्रदर्शनों का अंतर एक अहम पहलू है। व्यापार विश्लेषकों का अनुमान है कि महाराष्ट्र और कर्नाटक से उत्पादन सामान्य स्तर का लगभग एक-चौथाई ही रह सकता है। नतीजतन, Urad की कीमत का रुझान उत्तरी किसानों की क्षमता पर निर्भर करेगा कि वे अपने रकबे को बनाए रख पाते हैं या नहीं, और साथ ही सितंबर-अक्टूबर में मानसून के अंतिम चरणों के दौरान उपज की गुणवत्ता कैसी रहती है।
बाजार पर नजर रखने वालों को आने वाले हफ्तों में बारिश के अपडेट और बुवाई के आंकड़ों पर गौर करना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात उत्तरी क्षेत्रों में प्रति हेक्टेयर उपज होगी, क्योंकि मौसम संबंधी कोई भी और समस्या आपूर्ति-मांग संतुलन को और बिगाड़ सकती है और पूरे देश में दालों की कीमतों पर दबाव बढ़ा सकती है।
