अमेरिका में श्रिम्प इंडस्ट्री पर आयात का कहर
अमेरिकी श्रिम्प हार्वेस्टिंग इंडस्ट्री इस वक्त एक गंभीर आर्थिक मंदी से गुजर रही है। साल 2021 में जहां गल्फ श्रिम्प का रेवेन्यू $489 मिलियन था, वह 2023 तक घटकर सिर्फ $221 मिलियन रह गया, जो 50% से भी ज्यादा की गिरावट है। यह गिरावट ऐसे समय में आई है जब अमेरिकी ग्राहकों की मांग चार गुना बढ़ चुकी है। इसका सीधा मतलब है कि बाजार की करीब-करीब सारी बढ़ोतरी सस्ते आयात की वजह से हुई है।
साल 2023 में गल्फ श्रिम्प का औसत डॉकसाइड प्राइस $2 प्रति पाउंड से भी नीचे चला गया, जो ऐतिहासिक रूप से सबसे कम है। यह दिखाता है कि आयातित श्रिम्प का दबाव दशकों से बना हुआ है। नतीजतन, अमेरिका के कुल श्रिम्प बाजार में गल्फ हार्वेस्टेड श्रिम्प की हिस्सेदारी 1984 के 28.7% से घटकर अब मात्र 4.5% रह गई है। इससे इंडस्ट्री की लाभप्रदता (profitability) बुरी तरह प्रभावित हुई है, और फेडरल फ्लीट का प्रॉफिट मार्जिन 2023 में -6.1% रहा, जो संचालन को टिकाऊ नहीं बना रहा और नौकरियों के नुकसान व जहाजों के खड़े रहने की वजह बन रहा है। अमेरिकी उत्पादक अब विदेशी श्रिम्प की कम लागत और बड़े पैमाने के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर पा रहे हैं।
भारत का सीफूड एक्सपोर्ट बना रिकॉर्ड
दूसरी तरफ, भारत का सीफूड एक्सपोर्ट सेक्टर रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया है। वित्त वर्ष 2025-26 के लिए आए अस्थाई आंकड़ों के मुताबिक, कुल सीफूड एक्सपोर्ट ₹72,325.82 करोड़ (US$ 8.28 बिलियन) रहा। इसमें फ्रोजन श्रिम्प का योगदान सबसे ज्यादा रहा, जिससे US$ 5.51 बिलियन कमाए गए, जो कुल कमाई का दो-तिहाई से अधिक है। यह समग्र वृद्धि वैश्विक श्रिम्प बाजार में भारत के बढ़ते दबदबे को दिखाती है, जिसे सरकारी पहलों और प्रतिस्पर्धी उत्पादन लागत का सहारा मिला है।
हालांकि, इस सफलता के बावजूद अमेरिका के साथ व्यापार में बड़ी गिरावट आई है। अमेरिका, जो ऐतिहासिक रूप से भारत का सबसे बड़ा एक्सपोर्ट मार्केट रहा है, वहां शिपमेंट में वॉल्यूम के हिसाब से 19.8% और वैल्यू के हिसाब से 14.5% की कमी आई है। इस कमी का एक कारण अमेरिका की ट्रेड कार्रवाईयां हैं, जिसमें मार्च 2024 के शुरुआती नतीजे शामिल हैं, जिसमें कहा गया था कि भारतीय श्रिम्प उत्पादकों को प्रति-सब्सिडी (countervailable subsidies) मिल रही है। चीन और यूरोपीय संघ (EU) से बढ़ती मांग के कारण भारत के कुल एक्सपोर्ट्स में विस्तार जारी है, लेकिन अहम अमेरिकी बाजार में उसकी स्थिति सीधे चुनौतियों का सामना कर रही है।
अमेरिका की जांच और गुणवत्ता की चिंता
यू.एस. ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (USTR) का ध्यान भारत के श्रिम्प ट्रेड पर जाना, 11 मार्च को शुरू हुई एक बड़ी सेक्शन 301 जांच का हिस्सा है, जो 60 देशों की प्रथाओं को लक्षित करती है। USTR का दावा है कि भारतीय श्रिम्प उत्पादन को ईंधन, उपकरण, बुनियादी ढांचे और निर्यात प्रोत्साहन के लिए सरकारी सब्सिडी मिलती है, जिससे भारतीय उत्पादकों को अनुचित लाभ मिलता है। यह जांच इस बात की पड़ताल कर रही है कि क्या ये प्रथाएं अनुचित या भेदभावपूर्ण हैं और अमेरिकी वाणिज्य को नुकसान पहुंचाती हैं।
अमेरिकी श्रिम्प उद्योग अत्यधिक सब्सिडी वाली और बड़े पैमाने की विदेशी प्रतिस्पर्धा के खिलाफ संघर्ष कर रहा है। सस्ते आयात की बाढ़ से कीमतों में आई तेज गिरावट ने घरेलू संचालन को दशकों से आर्थिक रूप से अस्थिर बना दिया है। भारत की भारी निर्यात मात्रा और सरकारी समर्थन एक बड़ा फायदा है, लेकिन अतीत में FDA द्वारा की गई अस्वीकृतियों (refusals) ने उत्पाद की गुणवत्ता और नियामक अनुपालन संबंधी चिंताओं को जन्म दिया है, जैसे कि भारतीय श्रिम्प आयात में साल्मोनेला या प्रतिबंधित एंटीबायोटिक्स की मौजूदगी।
इसके अलावा, भारत का अमेरिकी बाजार पर निर्भरता उसके एक्सपोर्ट्स को ट्रेड बदलावों और अमेरिकी टैरिफ के प्रति संवेदनशील बनाती है, जैसा कि बढ़ती शुल्कों से पता चलता है। इक्वाडोर और वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धियों ने अमेरिका में बाजार हिस्सेदारी हासिल की है, जबकि भारत की शिपमेंट में बाधाएं आ रही हैं। यह दर्शाता है कि कैसे राष्ट्रीय नीतियां बाजार पहुंच और मूल्य निर्धारण को प्रभावित करती हैं। चल रही सेक्शन 301 जांच महत्वपूर्ण अनिश्चितता पैदा करती है, जिससे आगे व्यापार प्रतिबंध लग सकते हैं और सप्लाई चेन की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
