उत्तर प्रदेश के **11** प्रमुख जिलों में गन्ने की खेती का रकबा **1.6%** घटकर **17.14 लाख हेक्टेयर** रह गया है। इस गिरावट और सरकार द्वारा स्टॉक लिमिट घटाने के फैसले से आने वाले सीजन में चीनी मिलों की राह कठिन हो सकती है।
उत्तर प्रदेश की चीनी इंडस्ट्री, जो देश के चीनी उत्पादन में बड़ी भूमिका निभाती है, 2026-27 के सीजन के लिए मुश्किलों में घिरी दिख रही है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, राज्य के प्रमुख गन्ना उत्पादक जिलों में खेती का दायरा सिमटकर 17.14 लाख हेक्टेयर रह गया है। 1 अक्टूबर से शुरू होने वाले क्रशिंग सीजन को देखते हुए अब एनालिस्ट उत्पादन का अनुमान घटा रहे हैं। पहले जहां 1 करोड़ टन उत्पादन की उम्मीद थी, वहीं अब यह 90 लाख टन के आसपास सिमट सकता है।
सरकार की सख्ती का असर
सप्लाई साइड का दबाव तब और बढ़ गया जब 15 सितंबर 2026 को केंद्र सरकार ने डीलरों के लिए स्टॉक होल्डिंग लिमिट को 4,000 क्विंटल से घटाकर सीधे 2,000 क्विंटल कर दिया। इसका सीधा असर चीनी के 'एक्स-मिल' (Ex-mill) प्राइसेज पर पड़ता है, जिससे मिलों की कमाई पर लगाम लग रही है। इनपुट कॉस्ट ज्यादा होने और बिकवाली की कीमतें नियंत्रित रहने के कारण कंपनियों के मार्जिन पर गहरा असर पड़ना तय है।
ऑपरेशन्ल चुनौतियां और रिकवरी रेट
चीनी मिलों के सामने कच्चा माल जुटाने की भी बड़ी चुनौती है। खांडसारी और गुड़ (Jaggery) बनाने वाली इकाइयां किसानों को ज्यादा दाम ऑफर कर रही हैं, जिससे मिलों के पास गन्ना कम पहुंच रहा है। इसके अलावा, अगर मिलें जल्दी क्रशिंग शुरू करती हैं, तो 'शुगर रिकवरी रेट' (गन्ने से चीनी निकलने की दर) कम हो जाती है, जो कि मिलों की प्रॉफिटेबिलिटी का मुख्य आधार है।
एथेनॉल और भविष्य की राह
चीनी कंपनियों ने पिछले कुछ सालों में एथेनॉल ब्लेंडिंग से अपनी कमाई का जरिया डायवर्सिफाई किया है। लेकिन गन्ने की कमी का मतलब है कि अब एथेनॉल के लिए रॉ मटेरियल का आवंटन भी प्रभावित हो सकता है। आने वाले समय में निवेशकों के लिए शुगर रिकवरी रेट और सरकार की एक्सपोर्ट पॉलिसी पर नजर रखना बेहद जरूरी होगा।
