साल 2026 में भीषण सूखे के कारण इंग्लैंड का कृषि उत्पादन घटकर **16.03 मिलियन टन** रह गया है, जो कि **1984** के बाद का सबसे निचला स्तर है। इस सप्लाई संकट का सीधा असर ग्लोबल कमोडिटी की कीमतों पर पड़ सकता है, जिस पर भारतीय एफएमसीजी (FMCG) और फूड प्रोसेसिंग सेक्टर के निवेशकों को नजर रखनी चाहिए।
इंग्लैंड का कृषि क्षेत्र 1984 के बाद से अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। डिपार्टमेंट फॉर एनवायरनमेंट, फूड एंड रूरल अफेयर्स के डेटा के मुताबिक, गर्मियों के महीनों में लगातार पड़े सूखे और लू की वजह से फसलों की पैदावार में भारी कमी आई है।
फसलों का हाल
मौसम की मार का असर हर फसल पर दिखा है। विंटर व्हीट (Winter Wheat) की पैदावार 5 साल के औसत से 11% नीचे गिर गई है। वहीं, स्प्रिंग बार्ली में 17% और ओट्स में 14% की गिरावट दर्ज की गई है। ओट्स का उत्पादन तो 14 साल के निचले स्तर यानी 527,000 टन पर पहुंच गया है। हालांकि, रेपसीड (Rapeseed) का उत्पादन 43% बढ़कर 1 मिलियन टन रहा, लेकिन यह अन्य फसलों के बड़े नुकसान की भरपाई करने के लिए पर्याप्त नहीं था।
भारतीय निवेशकों के लिए मायने
ग्लोबल फूड सप्लाई चेन आपस में जुड़ी हुई हैं। जब ब्रिटेन जैसे बड़े उत्पादक देशों में फसल खराब होती है, तो ग्लोबल कमोडिटी मार्केट में गेहूं और जौ जैसी चीजों की कीमतें बढ़ने का खतरा बढ़ जाता है। भारत की एफएमसीजी और फूड प्रोसेसिंग कंपनियों के लिए कच्चा माल महंगा हो सकता है, जिससे उनके मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है।
यह स्थिति एग्री-टेक (Agri-tech), सिंचाई और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने वाली कंपनियों के लिए नए अवसर भी पैदा कर रही है। अब निवेशकों को ग्लोबल कमोडिटी इंडेक्स और घरेलू फूड कंपनियों की मैनेजमेंट कमेंट्री पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है, ताकि यह समझा जा सके कि यह सप्लाई स्ट्रेस आगे चलकर महंगाई को कितना बढ़ाएगा।
